‘स्मार्ट राइस पॉलिसी’ अपनाने की जरूरत

Edited By Updated: 28 Sep, 2026 06:36 AM

need to adopt smart rice policy

भारत का चावल उत्पादन एक दशक में पहली बार घटने के कगार पर है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार 2026-27 का उत्पादन घटकर लगभग 144 मिलियन टन (एम.टी.) रह सकता है, जो पिछले साल के 154 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन से 10 मिलियन टन यानी 6.5 प्रतिशत कम है।

भारत का चावल उत्पादन एक दशक में पहली बार घटने के कगार पर है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार 2026-27 का उत्पादन घटकर लगभग 144 मिलियन टन (एम.टी.) रह सकता है, जो पिछले साल के 154 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन से 10 मिलियन टन यानी 6.5 प्रतिशत कम है। यह 2009-10 के अल नीनो सूखे के बाद से सबसे बड़ी गिरावट है। मानसून की बारिश सामान्य से 15 प्रतिशत कम रही है, जिसमें चावल उगाने वाले कुछ राज्यों में 42 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। भारतीय निर्यात के दाम एक साल से भी अधिक समय के अपने उच्चतम स्तर पर हैं। यह झटका इस बात का परीक्षण करेगा कि हम चावल का प्रबंधन कैसे करते हैं, न कि इस बात का कि हम अपना पेट भर सकते हैं या नहीं।

11 सितम्बर तक धान की बुवाई 42.68 मिलियन हैक्टेयर पर थी, जो पिछले साल के 44.38 मिलियन हैक्टेयर से 3.8 प्रतिशत कम है। खरीफ सीजन में लगभग 2.8 टन प्रति हैक्टेयर चावल के हिसाब से, जो कुल उत्पादन का लगभग 4-5वां हिस्सा आपूर्ति करता है, बोए गए क्षेत्र में आई कमी केवल 5 मिलियन टन नुकसान की व्याख्या करता है। कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु कुल गंवाए गए 17 लाख हैक्टेयर के शुद्ध रकबे में से 12.3 लाख हैक्टेयर यानी 72 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। यू.पी., एम.पी., महाराष्ट्र और झारखंड इसमें 5.7 लाख हैक्टेयर और जोड़ते हैं। बाकी 5 मिलियन टन का नुकसान उपज में हुआ है, यानी फसल के पकने के समय पड़े सूखे के दौर के कारण दानों में 4-5 प्रतिशत का दुबलापन आया है।

आधा नुकसान उन खेतों में हुआ है जो बोए ही नहीं गए और आधा उन खेतों में, जिन्हें बोया तो गया लेकिन वे पानी से वंचित रह गए। इस वर्ष के 2,441 रुपए प्रति किं्वटल के एम.एस.पी. पर, 4.1 टन प्रति हैक्टेयर उपज देने वाला धान लगभग 1 लाख रुपए का सकल राजस्व देता है। मेरे अनुमानों के अनुसार 4-5 प्रतिशत की उपज हानि से औसत किसान को प्रति हैक्टेयर लगभग 4,500 रुपए का नुकसान होता है। जिन जिलों में वर्षा में 40 प्रतिशत की कमी आई है, वहां 1-5वां हिस्सा यानी 20,000 रुपए का नुकसान होना संभव है। 

तो फिर क्या किया जाना चाहिए?
निर्यात खुला रखें : गोदामों में 59.6 मिलियन टन स्टॉक होने के बावजूद, प्रतिबंध लगाने से किसानों को नुकसान होगा, थाईलैंड और वियतनाम में पहले से ही बढ़ रही वैश्विक कीमतों में और उछाल आएगा और अफ्रीका व एशिया के आयातकों के साथ संबंध खराब होंगे। यदि घरेलू कीमतें बढ़ती हैं, तो गैर-बासमती सफेद चावल के लिए एक प्रकाशित न्यूनतम निर्यात मूल्य का उपयोग करें, न कि पूर्ण प्रतिबंध का।
स्टॉक जारी करें : इस आपूर्ति वर्ष में आबंटित 7.2 मिलियन टन पर इथेनॉल के लिए अनाज के डायवर्जन को रोकें और पहले से प्रतिबद्धता जताएं कि यदि खुदरा चावल की मुद्रास्फीति मान लीजिए 8 प्रतिशत को पार करती है, तो एफ.सी.आई. का गैर-आबंटित चावल घाटे वाले राज्यों में खुले बाजार की बिक्री के लिए ऐसी आरक्षित कीमत पर भेजा जाए, जो लागत की भरपाई करे, न कि लागत से 40 प्रतिशत कम पर। प्रीमियम किस्मों को किसान बेहतर कीमतों के लिए खुले बाजार में बेचेंगे, इसलिए सरकारी खरीद को कम होने दे। यह बाजार द्वारा स्टॉक का प्रबंधन है।

सुधार के लिए संकट का उपयोग करें : अत्यधिक खरीद ने 49 मिलियन टन का अतिरिक्त बोझ खड़ा किया है। मूल्य और अनाज सबसिडी से धीरे-धीरे प्रत्यक्ष आय सहायता की ओर बढ़ें, बफर आकार को सही करें और कम अवधि वाली, सूखा-सहनशील किस्मों और सीधे बोए जाने वाले चावल को बढ़ावा दें, ताकि 2 से 7 साल में वापस आने वाला अगला अल नीनो जब आए, तो पैदावार सुरक्षित रहे, न कि सिर्फ गोदाम भरे रहें। भरे हुए अन्न भंडारों ने भारत को शांति दी है। असली परीक्षा यह है कि क्या दिल्ली उस राहत का उपयोग एक नियम-आधारित चावल नीति बनाने के लिए करती है, न कि फिर से आवेगपूर्ण हस्तक्षेप की ओर लौटने के लिए।-पूर्णादेव जेना

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