Edited By Niyati Bhandari,Updated: 25 Sep, 2026 01:45 PM
Baba Sodal Mela 2026: जानें, जालंधर के बाबा सोढल मेले की कथा, सोढल सरोवर का महत्व, टोपा प्रसाद, 14 बार मिट्टी निकालने और खेत्री बीजने की परंपरा।
Baba Sodal Mela 2026: पंजाब की धरती पर लगने वाले मेलों की अपनी अलग पहचान है। यहां के मेले सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं होते, बल्कि लोगों की आस्था, परंपरा और संस्कृति से भी जुड़े होते हैं। इन्हीं प्रमुख मेलों में जालंधर का श्री सिद्ध बाबा सोढल मेला भी शामिल है। हर साल भादों महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को लगने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा सोढल के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं। जालंधर जिला प्रशासन भी बाबा सोढल मेले को पंजाब के प्रमुख मेलों में गिनता है।
मान्यता है कि बाबा सोढल बच्चों और परिवार की खुशहाली की रक्षा करते हैं। श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और बाबा जी का आशीर्वाद लेते हैं। मेले के दौरान सोढल मंदिर और आसपास का पूरा इलाका भक्तिमय माहौल से भर जाता है।
खास है बाबा सोढल मेला
बाबा सोढल मेला जालंधर की धार्मिक और लोक-संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। विदेशों में रहने वाले पंजाबी परिवार भी बाबा सोढल के प्रति अपनी आस्था रखते हैं। 2026 में यह मेला आज 25 सितंबर को आयोजित हो रहा है। मेले के आसपास के दिनों में मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। भजन-कीर्तन, पूजा-अर्चना और प्रसाद के साथ पूरा वातावरण धार्मिक रंग में रंगा नजर आता है।
बाबा सोढल की कथा
बाबा सोढल की कथा स्थानीय लोक-मान्यताओं से जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, बाबा सोढल का जन्म जालंधर के चड्ढा परिवार में हुआ था। बचपन में वह बहुत चंचल और नटखट थे। कहा जाता है कि एक दिन वह अपनी माता के साथ तालाब के किनारे गए। माता वहां कपड़े धो रही थीं और बालक सोढल पास में खेल रहे थे। बार-बार तालाब के पास जाने पर माता ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लोककथा के अनुसार, गुस्से में माता के मुंह से उन्हें तालाब में चले जाने की बात निकल गई।
बालक सोढल ने माता की बात को आदेश मान लिया और तालाब में छलांग लगा दी। इसके बाद लोक-मान्यता के अनुसार वह नाग रूप में प्रकट हुए और फिर दिव्य रूप में विलीन हो गए। इसी घटना को बाबा सोढल की कथा का प्रमुख हिस्सा माना जाता है।
यह कथा अलग-अलग जगहों पर थोड़े अलग रूप में सुनाई जाती है, इसलिए इसे लोक-मान्यता और धार्मिक परंपरा के रूप में ही देखा जाता है।

सोढल सरोवर का महत्व
बाबा सोढल मंदिर के पास स्थित सोढल सरोवर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। मेले के दौरान भक्त सरोवर के जल को श्रद्धा से नमन करते हैं और जल का छिड़काव करते हैं। कई श्रद्धालु इसे पवित्र मानकर चरणामृत के रूप में भी ग्रहण करते हैं। मेले के दिनों में सरोवर और मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना करते दिखाई देते हैं।
चड्ढा और आनंद परिवार से जुड़ी खास परंपरा
बाबा सोढल मेले की कुछ परंपराएं खास तौर पर चड्ढा और आनंद बिरादरी से जुड़ी हुई हैं। इनमें मट्ठी यानी ‘टोपा’ प्रसाद की परंपरा प्रमुख है। लोक-मान्यता के अनुसार, बाबा सोढल ने नाग रूप में प्रकट होने के बाद इन परिवारों को विशेष प्रसाद चढ़ाने की परंपरा बताई थी। इस प्रसाद को लेकर बिरादरी में पीढ़ियों से कुछ विशेष नियम चले आ रहे हैं। इसी वजह से बाबा सोढल मेले में ‘टोपा’ प्रसाद की परंपरा को खास महत्व दिया जाता है।
पुत्रों के नाम पर 14 बार मिट्टी निकालने की परंपरा
बाबा सोढल मेले से जुड़ी एक और अनोखी परंपरा
14 बार मिट्टी निकालने की है। मान्यता के अनुसार, चड्ढा परिवार से जुड़े लोग अपने पुत्रों के नाम पर सरोवर के किनारे से मिट्टी निकालते हैं।
14 संख्या का संबंध भादों महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी यानी 14वीं तिथि से जोड़ा जाता है। इस परंपरा के पीछे परिवार की सुख-शांति और बच्चों की खुशहाली की कामना मानी जाती है। यह परंपरा बाबा सोढल मेले को दूसरे धार्मिक आयोजनों से अलग पहचान देती है।

घर में खेत्री बीजने की परंपरा
मेले से पहले खेत्री बीजने की भी परंपरा है। श्रद्धालु अपने घरों में जौ या अनाज के बीज बोते हैं। कुछ दिनों बाद जब इसमें हरियाली आती है तो इसे शुभ माना जाता है। मेले वाले दिन श्रद्धालु इस खेत्री को बाबा सोढल के दरबार में लेकर जाते हैं और श्रद्धा से अर्पित करते हैं। इसे परिवार की खुशहाली, समृद्धि और सुख-शांति से जोड़कर देखा जाता है।
मन्नत पूरी होने पर भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
बाबा सोढल के दरबार को लेकर लोगों में गहरी आस्था है। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर यहां आते हैं। स्थानीय धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से बाबा जी को याद करने और अरदास करने से मनोकामना पूरी होती है। मन्नत पूरी होने के बाद भी कई परिवार बाबा जी का धन्यवाद करने के लिए दरबार में पहुंचते हैं।
मेले में दिखती है पंजाब की लोक-संस्कृति
बाबा सोढल मेला केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यहां पंजाब की लोक-संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। मंदिर परिसर के आसपास श्रद्धालुओं की भीड़, धार्मिक गीत, प्रसाद की दुकानें और मेले का माहौल लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोग इस मेले में शामिल होते हैं। इस तरह बाबा सोढल मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं को भी आगे बढ़ाता है।
