आयुर्वेद के नाम पर कानून की अनदेखी करते नीम-हकीम!

Edited By Updated: 11 Sep, 2026 04:32 AM

quacks ignoring the law in the name of ayurveda

आयुर्वेद भारत की ज्ञान-परंपरा है, कोई टी.वी.-शीर्षक नहीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया उद्योग तेजी से बढ़ा है, कैमरे के सामने बैठकर गंभीर बीमारियों को ‘उलटने’ का वादा करने वाले स्व-घोषित ‘आयुर्वेदाचार्य’। इनमें कई चेहरे राष्ट्रव्यापी क्लिनिक...

आयुर्वेद भारत की ज्ञान-परंपरा है, कोई टी.वी.-शीर्षक नहीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया उद्योग तेजी से बढ़ा है, कैमरे के सामने बैठकर गंभीर बीमारियों को ‘उलटने’ का वादा करने वाले स्व-घोषित ‘आयुर्वेदाचार्य’। इनमें कई चेहरे राष्ट्रव्यापी क्लिनिक शृंखला, यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया और प्रायोजित खबरों के साथ घर-घर पहुंच चुके हैं। सवाल यह नहीं कि आयुर्वेद काम करता है या नहीं। सवाल यह है कि कुछ सुपरिचित ‘आचार्य’, ‘गुरु जी’, ‘स्वामी’ या ‘बाबा जी’ सार्वजनिक रूप से चिकित्सक की भूमिका निभाते हुए उन नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, जो इसी देश ने मरीज की सुरक्षा के लिए बनाए हैं।

आयुर्वेद का नैदानिक अभ्यास करने के लिए मान्यता प्राप्त योग्यता, सामान्यत: बी.ए.एम.एस. और राज्य परिषद तथा राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग के रजिस्टर पर नाम होना आवश्यक है। क्लिनिक, डे-केयर या अस्पताल चलाने के लिए नगर निगम का व्यापार लाइसैंस, जहां लागू हो वहां क्लिनिकल एस्टैब्लिशमैंट अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण, बायोमैडिकल अपशिष्ट की अनुमति और दवा बेचने पर औषधि कानून की शर्तें लगती हैं। ये कागजी औपचारिकताएं नहीं, न्यूनतम सुरक्षा पट्टियां हैं। इनके बिना किसी भी ‘आचार्य या बाबा जी के मार्गदर्शन में उपचार’ कहना जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

सबसे चालाक उल्लंघन उपाधि से शुरू होता है। ‘आचार्य’ कोई सरकारी मैडिकल लाइसैंस नहीं है। यह शिक्षक या सम्मानसूचक शब्द है, कभी विश्वविद्यालय की शास्त्रीय उपाधि भी होता है। इसे नाम के आगे लगाकर व्यक्ति आसानी से वैद्य जैसा दिख जाता है। कई वैबसाइटें ऐसे लोगों को ‘आयुर्वेद प्रैक्टिशनर’, ‘डिटॉक्स स्पैशलिस्ट’, ‘नैचुरोपैथ’, ‘हीङ्क्षलग एक्सपर्ट’ आदि लिखती हैं। क्लिनिक का बोर्ड और दवाओं की दुकानें उनके नाम से चमकती हैं। आम बोलचाल और प्रचार में भी उन्हें आयुर्वैदिक चिकित्सक कहा जाता है। लेकिन यदि कोई जांच करे तो ऐसे कुछ व्यक्तियों की शैक्षणिक योग्यता स्नातक या उससे भी कम की होती है, बी.ए.एम.एस. तो बिल्कुल भी नहीं। उल्लेखनीय है कि कानून उपाधि पर नहीं, रजिस्ट्रेशन पर चलता है। रजिस्टर में नाम नहीं, तो नैदानिक अभ्यास वैध आयुर्वेद नहीं, केवल अभिनय है।

दूसरा उल्लंघन दावों का है। औषधि एवं चमत्कारिक उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 ठीक उन्हीं बीमारियों के जादुई इलाज का विज्ञापन रोकता है, जिन्हें ये अभियान सबसे जोर से बेचते हैं। कैंसर, गुर्दा और यकृत की विफलता जैसी स्थितियां। ये लोग अपने प्रचार की प्रैस विज्ञप्ति और हैडलाइन में ‘आयुर्वेद कैंसर, लिवर फेलियर, किडनी फेलियर, ब्लड प्रैशर, हृदय रोग, मोटापा, डायबिटीज, आदि ठीक कर सकता है’ जैसा वाक्य बार-बार लिखते हैं। कानून के जानकार मानते हैं कि यह शिक्षा नहीं, उपचार का प्रस्ताव है। अगर दावा अतिरंजित या असत्यापित हो, तो यह विज्ञापन कानून का उल्लंघन है, चाहे वाक्य के अंत में ‘मार्गदर्शन’ ही क्यों न लिखा हो।

तीसरा उल्लंघन संरचना का है। कई दावे यह कहकर बचने का प्रयास करते हैं कि ऐसे समूह और आश्रम आदि के संस्थापक केवल प्रेरक हैं, इलाज तो रजिस्टर्ड बी.ए.एम.एस. डॉक्टर ही करते हैं। यदि वास्तव में प्रत्येक परामर्श योग्य वैद्य देता है, परिसर लाइसैंसशुदा है और दवाएं नियम के अनुसार बिकती हैं, तो मालिक का डॉक्टर न होना अपने आप में अवैध नहीं। लेकिन ब्रांडिंग उलटी दिशा में चलती है। मरीज ‘गुरु या आचार्य’ के भरोसे आता है, वीडियो में वही चेहरा गंभीर रोगों की कहानी सुनाता है कि कैसे उसने अपना पहला कैंसर या कैंसर पीड़ित जैसे मरीज को ठीक किया। प्रचार के लिए, वह व्यक्ति ऐसे वाक्य अपनी वैबसाइट पर भी लिखता है। गौरतलब है कि क्लिनिक का नाम उनके नाम पर होता है लेकिन सामग्री को ध्यान से पढ़ें तो असल में ‘डॉक्टर’ कोई और होता है। ऐसे भ्रामक तथ्य को जानबूझकर धुंधला रखा जाता है।

चौथा उल्लंघन परिसर का है। एक ही ब्रांड एक शहर में चल सकता है और दूसरे शहर में सील हो सकता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जहां राज्य के नॄसग होम कानून के तहत पंजीकरण न होने, दवा बिक्री की अनुमति न दिखाने और गंभीर रोगों के इलाज का विज्ञापन करने पर कई नीम-हकीमों के तथाकथित ‘अस्पताल’ बंद किए गए हैं। पांचवां उल्लंघन सबूत का है। आयुर्वेद की शास्त्रीय औषधियां और पंचकर्म मान्यता प्राप्त प्रणाली का हिस्सा हैं। लेकिन ‘जीवनभर की बीमारी तीन दिन में पलट जाएगी’, ‘मोटापा वापस नहीं आएगा’, ‘बड़ी से बड़ी पथरी गल जाएगी’  भ्रामक दावे हैं, चरक संहिता का श्लोक नहीं। कुछ उत्पाद पर नैदानिक अध्ययन या आयुष से जुड़े अनुमोदन का उल्लेख होता है। अध्ययन का अर्थ हर कैंसर या डायलिसिस-योग्य गुर्दा रोगी के ठीक होने का प्रमाण नहीं होता। मरीज को यह फर्क नहीं बताया जाता। नतीजा यह कि गंभीर बीमारियों से त्रस्त कई लोग जरूरी उपचार को टाल देते हैं और अपनी हालत बिगाड़ लेते हैं। आयुर्वेद की हानि यहां से शुरू होती है। असफलता का ठीकरा सच्ची चिकित्सा पर पड़ता है, उस चेहरे पर नहीं, जिसने कैमरे के सामने ऐसा भ्रामक चमत्कार भोली-भाली जनता को बेचा।

ऐसे में नियामकीय चुप्पी इस बाजार को हवा देती है। राज्य बोर्ड रजिस्टर सार्वजनिक रूप से आसानी से खोजे नहीं जाते। विज्ञापनों पर कार्रवाई विरल है। प्रायोजित ‘इनिशिएटिव’ खबरों का मुखौटा पहन लेता है। न्यायालय जब व्यक्तित्व अधिकार की रक्षा करता है, तो नकली विज्ञापन रुक सकते हैं लेकिन असली सवाल नहीं उठता, क्या वह व्यक्तित्व चिकित्सा पेशे का वैध सदस्य है? इन सबसे ऊपर, पुरस्कार और बड़े-बड़े मंच इस प्रश्न को और पीछे धकेल देते हैं। लेकिन दोष पूरे आयुर्वेद पर नहीं मढ़ा जा सकता। जो हजारों रजिस्टर्ड वैद्य चुपचाप नियम से काम करते हैं उनका नुकसान सबसे अधिक होता है। क्योंकि शोर उसी का सुनाई देता है, जो लाइसैंस से बड़ा दावा करता है। सुधार सरल हैं और जान-बूझकर टाले जाते हैं। प्रत्येक क्लिनिक के बोर्ड पर इलाज करने वाले चिकित्सक का नाम, योग्यता और पंजीकरण संख्या अनिवार्य हो। संस्थापक यदि रजिस्टर्ड नहीं है, तो विज्ञापन में ‘प्रैक्टिशनर’ शब्द निषिद्ध हो। कैंसर और अंग-विफलता जैसे दावों पर 1954 के कानून की तेजी से जांच हो। 

सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि मरीज को भी सतर्क होना चाहिए। अगली बार जब आप ऐसे किसी विज्ञापन के बाद किसी उपचार केंद्र में जाएं तो उपाधि मत पूछिए, रजिस्ट्रेशन पूछिए। चमत्कार मत पूछिए, लिखित निदान और सूचित सहमति पूछिए। आयुर्वेद को बचाना है तो उसे गुरु-व्यक्तित्व से अलग करना होगा। कानून पहले से मौजूद है। कमी नियम की नहीं, उन प्रसिद्ध चेहरों की जवाबदेही की है, जो नियम को ब्रांड से छोटा समझ बैठे हैं।-रजनीश कपूर 
 

Related Story

    Trending Topics

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!