Edited By ,Updated: 09 Jul, 2026 05:29 AM

देश तेजी से अराजकता की ओर बढ़ रहा है। अराजकता, बिना किसी शक के सरकारों के असंतोषजनक प्रदर्शन से उपजे लोगों के स्वत:स्फूर्त गुस्से में से पैदा होती है। परंतु लुटेरी शासक जमातें और इनके मोहरे बने प्रतिक्रियावादी तत्व भी इसे अक्सर हवा देते हैं।
हमीं ने जहर के बोए थे बीज धरती में, हमीं हैं आस में, अमृत जमीं से निकले! —नबील सईद
देश तेजी से अराजकता की ओर बढ़ रहा है। अराजकता, बिना किसी शक के सरकारों के असंतोषजनक प्रदर्शन से उपजे लोगों के स्वत:स्फूर्त गुस्से में से पैदा होती है। परंतु लुटेरी शासक जमातें और इनके मोहरे बने प्रतिक्रियावादी तत्व भी इसे अक्सर हवा देते हैं। सांप्रदायिक नफरत, कट्टरवाद, अविश्वास और हिंसा का जिस किस्म का तांडव आज नाचा जा रहा है, यह आजादी प्राप्ति के बाद पहले कभी नहीं देखा गया। 1975 में, तब की कांग्रेसी सरकार ने सत्ता पर कब्जा बनाए रखने की एकाधिकारवादी इच्छा के तहत देशवासियों पर आंतरिक आपातकाल थोप दिया था। लेकिन विभिन्न धर्मों, राष्ट्रीयताओं और जातियों से संबंधित अलग-अलग प्रांतों में रहने वाले देशवासी आपातकाल घोषित होने के कुछ समय बाद ही इस संविधान विरोधी कृत्य के खिलाफ एकजुट होने शुरू हो गए थे। 1977 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय आवाम की लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता के कारण कांग्रेस पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा था। तानाशाही का अंत हो गया था और संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक मूल्य फिर से बहाल हो गए थे।
परंतु साल 2014 के बाद से लगातार चली आ रही भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की मोदी सरकार ने देश के संविधान की मूल प्रस्थापनाओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की योजनाबद्ध धज्जियां उड़ाई हैं। आर.एस.एस. के दिशा-निर्देशों के तहत राज-काज चला रही मोदी सरकार का यह कारनामा, मूल रूप में 1975 में घोषित आपातकाल से कहीं ज्यादा खतरनाक है। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, ई.डी., सी.बी.आई. आदि संवैधानिक और स्वायत्त संस्थान संविधान-कानून के मार्गदर्शन में अपने कत्र्तव्य का पालन नहीं कर रहे। बल्कि मोदी सरकार के संरक्षण में आर.एस.एस. की विचारधारा के अनुसार कत्र्तव्य का पालन कर रहे हैं। उस पर सितम यह कि सभी प्रतिष्ठित पदों पर आर.एस.एस. से जुड़े व्यक्ति बिठा दिए गए हैं। मीडिया, विशेष रूप से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, मोदी सरकार और संघ-भाजपा की संकीर्ण सोच का प्रवक्ता बन गया है।
धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं, बहुजन समाज के खिलाफ हत्याओं सहित हर प्रकार के जुल्म ढाए जा रहे हैं। राज्य और प्रशासनिक तंत्र द्वारा प्रायोजित भीड़ें इन पर बेरोक-टोक ङ्क्षहसक हमले करती हैं। इन अमानवीय कृत्यों का तर्कसंगत विरोध करने वाले प्रगतिशील सोच के धारकों को ‘देशद्रोही’, ‘शहरी नक्सली’, ‘लव जेहाद के समर्थक’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘पाकिस्तान के एजैंट’, ‘विदेशी ताकतों के मोहरे’ आदि कहकर खूब बदनाम किया जा रहा है। ऐसे अनगिनत बुद्धिजीवी और आम लोग बिना कोई मुकद्दमा चलाए लंबे समय से जेलों में बंद हैं। भारत के ‘मुख्य चुनाव आयुक्त’ के एकतरफा और पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण रोज नए कारनामे हो रहे हैं। ई.सी.आई. मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एस.आई.आर.) की आड़ में अनावश्यक और असंभव शर्तें थोपकर करोड़ों भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित कर रहा है। ये असंवैधानिक कार्रवाइयां लोकतांत्रिक ढांचे को पंगु बना रही हैं।
कॉर्पोरेट घरानों, काले कारोबारियों और अनैतिक तरीकों से अमीर बनने वाले अन्य ‘भद्र पुरुषों’ ने भाजपा के लिए खजानों के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए हैं। चुनावों से संबंधित ‘आचार संहिता’ का महत्व सत्ताधारी पार्टी के लिए अब कागज पर लिखी महज एक इबारत से ज्यादा कुछ नहीं रहा। राजनीतिक क्षेत्र में जिस पूंजीवाद ने जागीरदारी ढांचे के दौरान प्रचलित राजशाही के मुकाबले ‘लोकतंत्र’ का संकल्प पेश किया था, वह संकल्प अब अर्थहीन होकर रह गया है। वैसे तो सारी दुनिया में ही, परंतु भारत में विशेष रूप से, शासक पक्ष ‘लोकतंत्र’ का खात्मा करके तानाशाही थोपने की राह पर चल पड़ा है।
आज की संकीर्णतावादी सत्ता और इसके उकसाए हुए गिरोह न केवल मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन आदि अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों, दलितों-महिलाओं, पिछड़े वर्गों, आदिवासियों और प्रगतिशील विचारकों को सांप्रदायिक ङ्क्षहसा का निशाना बना रहे हैं, बल्कि बहुसंख्यक आबादी के धर्म की विभिन्न धाराओं और मान्यताओं को भी धर्म की कथित रक्षा के पर्दे के पीछे इन कट्टर टोलियों की हुड़दंगी कार्रवाइयों का निशाना बनना पड़ रहा है।
महंगाई-बेरोजगारी, गरीबी-भुखमरी, कुपोषण और भ्रष्टाचार जैसी गंभीर बीमारियों की मार के नीचे आए आम देशवासी त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। परंतु लुटेरे शासक वर्गों के बहरे कानों तक उनकी पुकार नहीं पहुंच रही। अनावश्यक, विभाजनकारी मुद्दे उभारकर लोगों का ध्यान भटकाया जा रहा है। याद रहे, लोकतंत्र तकनीकी रूप से केवल वोट डालकर सरकारें चुनने तक सीमित ढांचा नहीं होता। लोकतंत्र के अंदर तो बल्कि देश का समग्र राजनीतिक-सामाजिक माहौल ऐसा दिखाई देना चाहिए, जिसमें हर व्यक्ति अपनी हिस्सेदारी महसूस करे और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा की पूर्ण गारंटी होने का अहसास करे।
अफसोस, देश के गैर-भाजपा राजनीतिक दल या तो आर.एस.एस. की सांप्रदायिक-फासीवादी विचारधारा से देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को पैदा हुए खतरों से पूरी तरह बेखबर दिखाई देते हैं या फिर स्वार्थ-सिद्धि के लिए चुप्पी साधे बैठे हैं। इसीलिए अब भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के प्रभाव वाले आम लोगों, विशेषकर मेहनतकशों को यह अपील करने का समय आ गया है कि वे देश और पंजाब के हितों को सामने रखते हुए अपने नेताओं के समय काटने वाले अवसरवादी रुख को दरकिनार कर दें।-मंगत राम पासला