मानो या न मानो:  ‘ईश्वर’ हमारी बात सुनते हैं

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 26 Jul, 2022 10:35 AM

god hears your heart

मनुष्य का जीवन सुख और दुख के मेल से ही बनता है। ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं जिसे जीवन में केवल सुख या दुख के दुॢदन देखने पड़ते हों लेकिन सुख और दुख दोनों को ही मनुष्य की परीक्षा का समय कहा जाए,

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God hears your heart: मनुष्य का जीवन सुख और दुख के मेल से ही बनता है। ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं जिसे जीवन में केवल सुख या दुख के दुॢदन देखने पड़ते हों लेकिन सुख और दुख दोनों को ही मनुष्य की परीक्षा का समय कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। मनुष्य की असली पहचान उसी समय की जा सकती है। सुख के समय वह केवल अधिक से अधिक आनंद समेटने में लगा रहता है। तब उसे अपने-पराए का आभास भी नहीं रहता। यहां तक कि अपनी खुशी में किसी और को भी शामिल करना पसंद नहीं करता। खुशी में फूल कर वह यह बात पूर्ण रूप से भूल जाता है कि उसे फिर से दुख का सामना भी करना पड़ सकता है।

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इसके विपरीत जो व्यक्ति जीवन की वास्तविकता को समझ लेता है वह किसी भी हालत में रहकर अपनी औकात नहीं भूलता और हमेशा जमीन से जुड़ा रह कर हर बात के लिए सदैव परमात्मा का शुक्र गुजार रहता है। अपने नित्य जीवन में उन्हें स्मरण करना कभी नहीं भूलता और कोई-कोई व्यक्ति दुख के समय इतना अधिक घबरा जाता है कि परमात्मा के बताए रास्ते से ही भटक जाता है।

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वह भूल जाता है कि हमारे लिए ईश्वर हम से भी अधिक सोचते हैं। उनका सोचा हुआ हमारे लिए कभी गलत नहीं हो सकता। सुख-दुख दोनों ही हालात में हम जब परमात्मा को स्मरण करते हैं तो केवल अपना कर्तव्य मानकर करते हैं। कभी-कभी हमारे अंदर धर्म के प्रति रहने वाली आस्था हमें पूजा-पाठ करने को मजबूर करती है और कभी-कभी कुछ पाने की इच्छा भी हमें पूजा-पाठ के लिए प्रोत्साहित करती है।

हम अनेक बार यह मान बैठते हैं कि पूजा तो करते हैं लेकिन हमारी बात उन तक (परमेश्वर तक) नहीं पहुंच पाती। यदि पहुंचती तो क्या भगवान हमारी बात सुनते नहीं।

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देखा जाए तो परमात्मा को कभी हम सही रूप से पुकारते नहीं, अपने दिल को उनके पास लगाते नहीं। केवल फूल, चंदन, भोग, अर्पण करने से पूजा नहीं होती। इसके लिए सर्वप्रथम अपने मन को उनके पास लगाना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए हम धूमधाम से पूजा करने लगते हैं।

परंतु क्या ईश्वर को इन सब चीजों की जरूरत है? ईश्वर को लुभाने के लिए केवल हमारे अंदर रहने वाले भाव की जरूरत है।
हमारा गंतव्य स्थान कुछ और हो तथा हम कुछ अलग रास्ता अपनाएं तो हम कैसे अपनी मंजिल पर पहुंच पाएंगे। इसीलिए ईश्वर को सदैव अपने हृदय में बिठा लें, उन्हें हर सुख-दुख में शामिल करें, अपने से अलग ही नहीं सोचें, तब वह भी हमारे लिए सोचेंगे।
हर घड़ी उनके लिए अपना प्रेम भाव रखें। यदि हम उन्हें सदा याद रखें तो हमसे गलत कार्य हो ही नहीं सकते। वह हमारी जटिल परिस्थितियों को सुधारते हैं लेकिन हम ईश्वर को सच्चे और निष्कपट भाव से पुकारते नहींं।

(‘प्रभु प्रेम पुकार’ से साभार)

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