मुहर्रम 2019: क्या है ताजियादारी, शिया-सुन्नी में इसको लेकर है कैसा मतभेद

Edited By Updated: 10 Sep, 2019 04:32 PM

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जैसे कि सब जानते हैं आज यानि 10 सितंबर को मुहर्रम की 10वीं तारीख़ है। मुस्लिम धर्म की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार मुसलमान मुहर्रम की 9वी और 10वीं तारीख को रोज़े रखने की परंपरा है।

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जैसे कि सब जानते हैं आज यानि 10 सितंबर को मुहर्रम की 10वीं तारीख़ है। मुस्लिम धर्म की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार मुसलमान मुहर्रम की 9वी और 10वीं तारीख को रोज़े रखने की परंपरा है। साथ ही इस दौरान लोग अपने घरों में व मस्जिदों में इबादत करते हैं। कहा जाता है मुहर्रम मुसलमानों का कोई त्यौहार नहीं है, बल्कि ये सिर्फ इस्लामी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। लगभग विश्व भर के सारे मुसलमान मुहर्रम की नौ और दस तारीख को रोज़ा रखते हैं। बताया जाता है मुसलमान लोग मुहर्रम के महीने में इमाम हुसैन की शहादत के गम में मातम मनाते हैं।
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वहीं बात करें ताजिया की तो यह परंपरा भारत से ही शुरू हुई थी। भारत में ताजिए की शुरुआत बादशाह तैमूर लंग ने की थी। कहते हैं तुर्की के योद्धा तैमूर लंग का विश्व पर जीत पाने का सपना था। फारस, अफगानिस्तान, मेसोपोटामिया और रूस के कुछ भागों को जीतते हुए तैमूर 1398 में भारत पहुंचा। उसने दिल्ली को अपना ठिकाना बनाया और यहीं उसने खुद को सम्राट घोषित कर दिया। कहा जाता है तैमूर लंग शिया संप्रदाय से था।

तैमूर लंग ने मुहर्रम के इस महीने में इमाम हुसैन की याद में दरगाह जैसा एक ढांचा बनवाकर उसे विभिन्न तरह के फूलों से सजवाया था। जिस ताजिया का नाम दिया गया था। इसके बाद ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती जब भारत आए तो उन्होंने अजमेर में एक इमामबाड़ा बनवाया और उसमें ताजिया रखने की एक जगह बनाई। भारत के बाद पाकिस्तान और बंगालदेश में भी ताजिया बनाने की शुरूआत की। बता दें मुहर्रम का चांद निकलने की पहली तारीख़ से ताजिया रखने का सिलसिला शुरू हो जाता है जिसे 10 मुहर्रम को दफ्न कर दिया जाता है।
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हमेशा से ताजियादारी को लेकर शिया और सुन्नी समुदाय के लोगों में मतभेद रहा है। सुन्नी समुदाय में ताजियादारी को निषेध बताया गया है। ये लोग ताजियादारी को इस्लाम का हिस्सा नहीं मानते हैं। हालांकि देश के कई राज्यों में सुन्नी समुदाय का एक बड़ा तबका ताजियादारी करता है और कुछ लोग तो इमाम हुसैन के गम में शरबत बांटने, खाना खिलाने और लोगों की मदद करने को भी जायज मानते हैं। सुन्नी समुदाय के अनुसार इस्लाम में सिर्फ मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को रोजा रखने का हुक्म है लेकिन उसका भी ताल्लुक इमाम हुसैन की शहादत से नहीं है।
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