तेजा सिंह समंदरी : गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के नैतिक पथ-प्रदर्शक

Edited By Updated: 17 Jul, 2026 11:40 AM

teja singh samundri the moral guiding light of the gurdwara reform movement

सिख इतिहास में सरदार तेरी जिन्होंने अपने लिए नहीं बल्कि संस्थाओं और सिद्धांतों के किया। 17 जुलाई 2026 को कहा के 100 वर्ष पूर्ण होते हैं। यह केवल एक ऐतिहासिक वर्षगांठ नहीं, बरिन्क उत्कीर कि क्या हमने उनके संथर से प्रशिक्षकों को अपने आचरण में उताव है...

नेशनल डेस्क:  सिख इतिहास में सरदार तेरी जिन्होंने अपने लिए नहीं बल्कि संस्थाओं और सिद्धांतों के किया। 17 जुलाई 2026 को कहा के 100 वर्ष पूर्ण होते हैं। यह केवल एक ऐतिहासिक वर्षगांठ नहीं, बरिन्क उत्कीर कि क्या हमने उनके संथर से प्रशिक्षकों को अपने आचरण में उताव है हॉल' केवल एक नहीं बल्कि उस महान व्यकिरण की विहसत का प्रतीक है जिसने सिद्ध किया कि संस्थाएं व्यडियों में कड़ों बड़ी होती हैं।

यदि बाबा सड़क सिह गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की बुलंद आवाज थे तो हा सिह समुंदरी उस आंदोलन के नैतिक स्तंभ और अनुशासित रणनीतिकार से 1201 20 फरवरी 1832 को बुरज राय का (तरतारल) में जन्मे समुंदरी जी ने ब्रिटिश सेना से प्राप्त अनुशासन और संगठन कौशल को पंथ की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका विश्वास था कि कोई भी आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब यह नैतिकता, अनुशासन और सुरमत के सिद्धांतों पर आधारित हो।

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण-रकाबगंज, वादियों का मोर्चा, गुरु का बाग, जैतो तथा नाथा आंदोलन में उनकी दूरदृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। काबगंज के प्रश्न को उन्होंने सिख स्वाभिमान और धार्मिक अधिकारों का विषय बना जबकि 1921 के चाबियों के मोर्च में उनके शांतिपूर्ण और अनुशासित नेतृत्व में सरकार की चाबियां लौटाने के लिए विवश कर दिया। महात्मा गांधी ने इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पहली महत्वपूर्ण नैतिक विजय कहा था। गुरु का बाग मोर्चे के दौरान भी उन्होंने हजारों कारने की शर्त मानने से इंकार कर दिया और जैल में रहना स्वीकार किया।

उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली माध्यम माना। खालसा विद्यालयों के विकास, ज्ञान के प्रसार तथा महिला शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इस बात का प्रमाण है कि ये शिक्षा को समाज और समुदाय की दीर्घकालिक शक्ति मानते थे। उनकी निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च उदाहरण ब सामने आया जब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की कानूनी वाई के लिए उन्होंने अपनी भूमि गिरवी रखकर आर्थिक सहायता प्रदान की और बाद में वह धन चापस लेने से भी इंकार कर दिया। 1923 में श्री रिमंदिर साहिल की कार सेवा के लिए उन्हें पांच प्यारों में सम्मिलित किया जाना उनके चरित्र पर पंथ के विधास की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थी।

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन केवल धार्मिक प्रबंधन के सुधार का अभियान नहीं था। यह जनभागीदारी सिद्धांतनिर नेतृत्व, संस्था निर्माण और पंचक अधिकारों के लिए संघर्ष का अंआंदोलन था। इस आंदोलन में तेजा सिंह समुंदरी की सबसे बड़ी विशेषता यह भी कि उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा। उनके लिए व्यक्ति नहीं, संस्था महत्वपूर्ण थी। पद नहीं, सिद्धांत सर्वोपरि थे और व्यक्तिगत प्रसिद्धि नहीं, बल्कि पंथ त्या समाज का हित सर्वोल्य था। इसी कारण उन्हेंनि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को सराक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कान जाव की सबने चड़ी आवश्यकता भी यही है। हमारी अनेक सार्वजनिक संस्थाएं व्यक्ति केंद्रित होती जा रही हैं। जब संस्थानों की पहचान किसी एक व्यति से जुड़ जाती है, तब उनकी स्वतंत्रता और विधसनीयता कमजोर होने लगती है।

आज नेतृत्व को सफलता को प्रायः सत्ता, प्रचार और प्रभाव के आधार पर आंका जाता है। किंतु इतिहास बताता है कि स्थायी और आदर्श नेतृत्व को नींव चरित्र, सत्यनिाह और जनविश्वास पर आधारित होती है। तेजा सिह समुंदरी लोगों के हृदयों में इसलिए बसे क्योंकि उन्होंने वही जीवन जिया जिसकी वे शिक्षा देते थे। शिक्षके प्रति उनको दूरदर्शिता आज भी अत्यंत प्रास है। उन्होंने समझ लिया था कि धार्मिक जागरूकता के साथ-साथ आान और शिक्षा के बिना कोई भी समाज नलंबे समय तक प्रगति नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने श्रीखालसा विद्यालयों के विकास, महिला शिक्षा तथा


आज 100वीं शहादत वर्षगांठ पर विशेष

अकालियों को ब्रिटिश शासन के अमानवी अत्याचारों के बावजूद अहिंसक और अनुशासिक बनाए रखा। जैतो और नाभा आंदोलनों में उन स्पष्ट किया कि सिद्धांतों से समझौता करके प्राप्त विजय वास्तविक विजय नहीं होती। 17 जुलाई 1928 को ताहीर जेल में उसका निधन हुआ जिसे सिख समुदाय ने शहादत के रूप में स्वीकार किय क्योंकि उन्होंने सरकार द्वारा अकाली नेताओं अपमानित करने के उद्देश्य से उनकी रिहाई से पहले गुरुद्वारा अधिनियम को लिखित रुप में स्वीकार करने की शर्त मानने से इनकार कर दिया और जेल में रहना स्वीकार किया

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