बिल्डरों पर इन 6 कारणों से नहीं हो रही सख्ती, उपभोक्ता निराश

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Saturday, May 20, 2017-10:00 AM

नई दिल्ली: मकान के खरीदार रीयल एस्टेट (रैगुलेशन एंड डिवैल्पमैंट) एक्ट (रेरा), 2016 के लागू होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। इस साल यह 1 मई से पूरी तरह लागू हो गया है। उपभोक्ताओं को उम्मीद थी कि रेरा बिल्डरों की ओर से फ्लैट सौंपने में होने वाली देरी पर अंकुश लगाएगा। साथ ही उनके नुक्सान की भी भरपाई होगी लेकिन 6 ऐसी वजहें हैं जिसके चलते फिलहाल उपभोक्ताओं को इससे निराशा हाथ लगी है। केन्द्र सरकार रेरा को लेकर गंभीर है लेकिन राज्यों की ओर से नियामक के गठन में देरी परेशानी का सबब बन रही है।

ये है वो कारण
-रेरा से जुड़े 59 कानून पिछले साल अप्रैल में अधिसूचित हो गए थे और 1 अप्रैल 2016 से यह आंशिक तौर पर लागू हो गया था। इसके तहत 6 साल के भीतर सभी राज्यों को इसे अधिसूचित करना था लेकिन 30 अप्रैल तक कुछ राज्यों ने ही अधिसूचित किया।
-रेरा के तहत राज्यों में 30 अप्रैल 2017 तक नियामक बनाना जरूरी था लेकिन अब तक किसी भी राज्य में नियामक का गठन नहीं हुआ है। राज्यों को यह अधिकार है कि वे किसी अधिकारी को अंतरिम तौर पर नियामक की जिम्मेदारी दे सकें।
-रेरा कानून के तहत एक अपीलीय प्राधिकरण (ट्रिब्यूनल) का गठन भी अनिवार्य है। 30 अप्रैल 2017 इसके लिए अंतिम समय सीमा थी। अपीलीय प्राधिकरण इसलिए जरूरी है कि यदि खरीदार रेरा के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं तो वे प्राधिकरण में जा सकते हैं।
-कानून के तहत सभी बिल्डरों को निर्माणाधीन प्रोजैक्ट का रेरा के तहत 31 जुलाई तक पंजीकरण कराना जरूरी है लेकिन कई राज्यों ने इस नियम को ही खत्म कर दिया है। कुछ अन्य राज्यों ने नियम आसान कर दिए हैं।
-रीयल एस्टेट एजैंट को भी रेरा के तहत 31 जुलाई तक पंजीकरण कराना अनिवार्य है। इसमें जमीन, मकान या दूसरी तरह की अचल सम्पत्ति की खरीद-बिक्री करने वाले व्यक्ति या संस्थाएं भी शामिल हैं।
-रेरा के लागू होने के एक साल के भीतर वैबसाइट बन जानी चाहिए थी। इससे खरीदारों को घर बैठे सभी जानकारी मिल जाती। खरीदार को प्रोजैक्ट मंजूरी, बिल्डर और रीयल एस्टेट एजैंट के बारे में सही जानकारी मिलेगी।

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