आपमें किस चीज की स्मृति बनी रहे?

  • आपमें किस चीज की स्मृति बनी रहे?
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Thursday, August 22, 2013-6:35 AM

स्मृति का शब्दार्थ है याद बनी रहे। आपके चिंतन, धारणाओं तथा अभीप्साओं में मात्र जगत है और कुछ नहीं अत: आपमें किस चीज की याद या स्मृति बनी रहे? कभी-कभी हम भगवान से प्रार्थना में यह बात कहें, ‘‘हे देव! आपकी कृपा से हम वंचित नहीं हैं। बस हमें यह ध्यान बना रहे कि आपका अनुग्रह हम पर है। हम यह शिकायत करना छोड़ दें कि आपका अनुग्रह हम पर नहीं है।’’

भगवान की कृपा हम पर है ही, यह बात हमारे संज्ञान में बनी रहनी चाहिए। जब यह स्मृति आपको बनी रहेगी तो निर्भार-निश्चिंत हो जाएंगे। आपको लगेगा कि भगवान शक्तिशाली हैं। उनके जैसा सामर्थ्य किसी के पास नहीं है। ऐसे में आपमें भय नहीं रहेगा, अवसाद नहीं रहेगा।

स्मृति का अर्थ यह भी है कि आत्मा की स्मृति बनी रहे, देह की नहीं। हम निरंतर देह की स्मृति में बने रहते हैं। हम तो खुद को शरीर माने बैठे हैं। स्मृति का एक अन्य अर्थ है-आत्म स्मृति यानी आप अपने स्वभाव में लौटकर आएं और इसमें एक दूरी बनी रहे।  तुममें और परमात्मा में दूरी अवसाद ला रही है, तनाव ला रही है और यही भय ला रही है। इसका कारण यह है कि तुम्हारे और संतों के बीच, तुम्हारे और गुरु के बीच, तुम्हारे और भगवान के बीच में कुछ दूरी आ गई है।
 
हम अपनी स्मृति में जगत को रखते हैं। हमारी स्मृति में पदार्थ है। हमारी स्मृति में यही है कि इन्हें कैसे प्राप्त कर लें? यही लक्ष्य है हमारा, हमारी स्मृति में यही रहता है। स्मृति मात्र यह है कि देह सुख किसमें छिपे हुए हैं? दैहिक आकर्षण की पूर्ति में ही हमारी स्मृति है। हमें निरंतर देह की याद रहती है कि मैं ‘ये’ हूं। देह की पूर्ति कभी नहीं हो सकती। यह एक रस नहीं है। यह दुख का एक कारण है। इसका निरंतर स्मरण रखना ही भयकारक है।


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