राधा नाम के जाप से श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं

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Thursday, September 12, 2013-10:42 AM

श्री राधा जी भगवान श्री कृष्ण की परम प्रिया हैं तथा उनकी अभिन्न मूर्ति भी। राधा जी भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अघिष्ठात्री देवी हैं, अत: भगवान इनके अधीन रहते हैं। श्री राधा जी का एक नाम कृष्णवल्लभा भी है क्योंकि वे श्रीकृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली हैं।

भगवान श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट हैं— द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज रूप में वे बैकुंठ में देवी लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और तुलसी के साथ वास करते हैं परन्तु द्विभुज रूप में वे गौलोक घाम में राधा जी के साथ वास करते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था कि एक को कष्ट होता तो उसकी पीड़ा दूसरे को अनुभव होती। राधा जी श्रीकृष्ण का अभिन्न भाग हैं।

इस तथ्य को इस कथा से समझा जा सकता है कि वृंदावन में श्री कृष्ण को जब दिव्य आनंद की अनुभूति हुई तब वह दिव्यानंद ही साकार होकर बालिका के रूप में प्रकट हुआ और श्री कृष्ण की यह प्राण शक्ति ही राधा जी हैं। श्री राधा जन्माष्टमी के दिन व्रत रख कर मन्दिर में यथा विधि राधा जी की पूजा करनी चाहिए तथा श्री राधा मंत्र का जाप करना चाहिए।

राधा जी का नाम कृष्ण से भी पहले लिया जाता है। राधा नाम के जाप से श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर दया करते हैं। राधा जी का श्री कृष्ण के लिए प्रेम नि:स्वार्थ था तथा उसके लिए वे किसी भी तरह का त्याग करने को तैयार थीं। राधा जी ने यह कहकर अपनी चरण धूलि दी कि भले ही मुझे 100 नरकों का पाप भोगना पडे तो भी मैं अपने प्रिय के स्वास्थ्य लाभ के लिए चरण धूलि अवश्य दूंगी।

कृष्ण जी का राधा से इतना प्रेम था कि कमल के फूल में राधा जी की छवि की कल्पना मात्र से वो बेहोश हो गये तभी तो विद्ववत जनों ने कहा

राधा तू बडभागिनी, कौन पुण्य तुम कीन।
तीन लोक तारन तरन सो तोरे आधीन।।


केवल किशोरी जी का ही नहीं, हमारे अन्य रसिक नृपति परम श्रधेय स्वामी श्री हरिदास जी महाराज का प्रादुर्भाव भी इसी दिन हुआ था इसलिए हमारे वृन्दावन में हरिदास जी का बधाई उत्सव मनाया जाता है। लगभग एक सप्ताह पूर्व ही बधाई उत्सव प्रारंभ हो जाता है और राधाष्टमी के दिन संध्या काल में श्री बिहारी जी कि सवारी निधिवन राज पधारती है और गोस्वामी वर्ग, समाज गायन करते हुए चाव की सवारी के साथ हरिदास जी महाराज को बधाई देने के लिए आते है। इस दिन वृन्दावन में कई सांकृतिक कार्यक्रम और स्पर्धाओं का आयोजन होता है।

                                                                             -भागवत आचार्य श्री रवि नंदन शास्त्री जी  महाराज जी


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