जो श्री राधे और श्री कृष्ण में भेद करता है वह कभी भी साधना नहीं कर सकता

  • जो श्री राधे और श्री कृष्ण में भेद करता है वह कभी भी साधना नहीं कर सकता
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Friday, September 13, 2013-7:35 AM

राधा श्री राधा रटूं, निसि-निसि आठों याम।
जा उर श्री राधा बसै, सोइ हमारो धाम


जब-जब इस धराधाम पर प्रभु अवतरित हुए हैं उनके साथ साथ उनकी आह्लादिनी शक्ति भी उनके साथ ही रही हैं। स्वयं श्री भगवान ने श्री राधा जी से कहा है - "हे राधे! जिस प्रकार तुम ब्रज में श्री राधिका रूप से रहती हो, उसी प्रकार क्षीरसागर में श्री महालक्ष्मी, ब्रह्मलोक में सरस्वती और कैलाश पर्वत पर श्री पार्वती के रूप में विराजमान हो।"

भगवान के दिव्य लीला विग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में अपनी आराध्या श्री राधा जू के निमित्त ही हुआ है। श्री राधा जू प्रेममयी हैं और भगवान श्री कृष्ण आनन्दमय हैं। जहां आनन्द है वहीं प्रेम है और जहां प्रेम है वहीं आनन्द है। आनन्द-रस-सार का धनीभूत विग्रह स्वयं श्री कृष्ण हैं और प्रेम-रस-सार की धनीभूत श्री राधारानी हैं अत: श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही हैं।

श्रीमद्भागवत में श्री राधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है। किन्तु वह उसमें उसी प्रकार विद्यमान है जैसे शरीर में आत्मा। प्रेम-रस-सार चिन्तामणि श्री राधा जी का अस्तित्व आनन्द-रस-सार श्री कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला को प्रकट करता है। श्री राधा रानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य निरंतर आनन्द-रस-सार, रस-राज, अनन्त सौन्दर्य, अनन्त ऐश्‍वर्य, माधुर्य, लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करती हैं।

 श्री कृष्ण और श्री राधारानी सदा अभिन्न हैं। श्री कृष्ण कहते हैं - "जो तुम हो वही मैं हूं हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं। जैसे दूध में श्‍वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूं।"

श्रीराधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम। करहुं निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥

राधा भाव निश्चय ही महा भाव है और उससे ऊंची प्रेम की कल्पना का चित्र हमारी संस्कृति व साहित्य में है भी नहीं। लक्ष्मी श्री विष्णु के चरणों में सदैव विराजमान रहती हैं। सीता माता ने भी सदैव श्री राम का साथ निभाया उन्हें वन में भी अकेले न जाने दिया। पार्वती हर जन्म में श्री शिव को प्राप्त हुई। केवल यही प्रेम की साधना का ऐसा उदाहरण है जिसमें प्रेम कर्तव्य पक्ष पर जाने वाले कृष्ण के पैर की बेड़ी नहीं बना भले ही राधा सूख-सूख कर कांटा बन गई।

सच्चे प्रेम में प्रेमी के पार्थिव शरीर की उपस्थिति का परितार बड़ी ऊंची स्तर की बात है। प्रेम में अधिकतम त्याग कभी शादी न करना राधा का यह कौमार्य आजीवन उत्सर्ग को सदा अन्नत प्रेमा धार रसधार श्री राधा का नाम श्री कृष्ण से भी पहले लेने को प्रेरित करता रहेगा। उनका पावन नाम भक्तो को तारता रहेगा।

 श्री कृष्ण स्पष्ट करते है कि,"राधा और मैं दो नहीं एक ही हैं। तेज को मैं दो में इसलिए बांट देता हूं कि मैं स्वंय इस अवतार में रपास्वादन करना चाहता हूं क्योंकि पहले में मर्यादा में बंधा था। अब इस अवतार में पूर्ण रस में लीन रहना चाहता हूं। वही रस सागर श्री राधे हैं। जो श्री राधे और श्री कृष्ण में भेद करता है वह कभी भी साधना नहीं कर सकता।"





 


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