ग्रहस्थ जीवन में कलह तथा दरिद्रता से निजात पाना चाहते हैं तो...

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Friday, October 04, 2013-7:07 AM

कुआर(आश्विन) का कृष्णपक्ष जिसमें पितरों के लिये तर्पण और श्राद्ध आदि किया जाता है, यद्यपि प्रत्येक अमावस्या पितरों की पुण्य तिथि होती है किंतु आश्विन मास की अमावस्या पितृ पक्ष के लिए उत्तम मानी गई है। इस अमावस्या को सर्व पितृ विसर्जनी अमावस्या अथवा महालया के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रोक्त विधि से किया हुआ श्राद्ध कल्याणकारी होता है। जो लोग शास्त्रोक्त समस्त श्राद्धों को न कर सकें, उन्हें कम से कम आश्विन मास में पितृगण की मरण तिथि के दिन श्राद्ध करना चाहिए।

भाद्र शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा से पितरों का दिन आरम्भ हो जाता है। यह सर्व पितृ अमावस्या तक रहता है। जो व्यक्ति पितृपक्ष के पन्द्रह दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं कर पाते और जिन पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो, उन सबके श्राद्ध, तर्पण इत्यादि इसी अमावस्या को किया जाता है इसलिए अमावस्या के दिन पितर अपने पिण्डदान एवं श्राद्ध आदि की आशा से आते हैं।यदि उन्हें वहां पिण्डदान या तिलांजलि आदि नहीं मिलती, तो वे अप्रसन्न होकर चले जाते हैं। जिससे पितृदोष लगता है और कुटुम्ब को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

महालय श्राद्ध भी कहलाते हैं महा से अर्थ होता है ‘उत्सव दिन’ और आलय से अर्थ है ‘घर’ अर्थात कृष्ण पक्ष में पितरों का निवास माना गया है इसलिए इस काल में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किए जाते हैं जो महालय भी कहलाता है। यदि कोई परिवार पितृदोष से कलह तथा दरिद्रता से गुजर रहा हो और पितृदोष शांति के लिए अपने पितरों की मृत्यु तिथि मालूम न हो तो उसे सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध – तर्पण करना चाहिए।

                                                                                                                              - आचार्य पंडित तिलक मणि जी
 

 


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