रावण : जो अहं से हार गया

  • रावण : जो अहं से हार गया
You Are HereDharm
Saturday, October 12, 2013-3:54 PM

दशहरे के दिन जब रावण जलता है तो हर कोई झूम उठता है और संतुष्ट हो जाता है कि आज उसने बुराई पर विजय पा ली। वास्तव में अपने मन में झांक कर देखा जाए तो हमारे ही भीतर एक रावण जिंदा है। हम अपने भीतर के रावण का एक अंश भी जला नहीं पाते और न ही उसे स्वीकार कर पाते हैं। दशानन ने अपने तप से न केवल ब्रह्मा और शिव को प्रसन्न किया बल्कि वह वेदों का ज्ञाता भी था परंतु उस प्रकांड ज्ञानी के सारे गुण उसके अहंकार के आगे गौण होकर उसके अंत का कारण बने।

रावण के दस अवगुण :
1. क्रोध : रावण स्वभाव से ही क्रोधी था। उसका क्रोध ही तो था जिसने सीता हरण कर अपने पुत्रों तक को मौत की बलि चढ़ा दिया और स्वयं भी उस क्रोध की अग्नि में जल कर नष्ट हो गया।

2.  छल-कपट : रावण दैत्य था उसमें छल-कपट की भावना सबसे ज्यादा थी। ऐसा न होता तो न वह कुबेर से लंका का राज्य छीन पाता और न ही सीता जी का हरण करने के लिए साधु बनता। इसी के चलते उसने अपने हितैषियों को भी शत्रु बना लिया था।

3.  क्रूरता : क्रूरता की ऐसी मिसाल और कहां मिलेगी कि श्री राम के दूत बन कर रावण को समझाने लंका पहुंचे हनुमान जी की पूंछ तक में उसने आग लगा दी। उस युग में ही नहीं, आज भी दूत का सम्मान किया जाता है परंतु रावण ने क्रूरता के चलते अपनी दुश्मनी को और अधिक बढ़ावा दिया।

4.  हठ और मनमानी : राजनीति से लेकर रिश्तों तक में वह मनमानी करने का आदी था। अपने हठ के आगे वह किसी की सलाह और अनुरोध मानना जानता ही नहीं था तभी तो सीता जी का हरण करने के पश्चात उन्हें छोडऩे के लिए परिजनों का अनुरोध और सुझाव तक उसने ठुकरा दिया था।

5. काम वासना :
पर-स्त्री मोह आज भी निंदनीय माना जाता है किंतु रावण ने काम-वासना में अंधे होकर सीता जी का हरण किया था। न तो वह भगवान श्री राम को सीता लौटाने को और न ही उनसे क्षमा-याचना को राजी हुआ।

6.  बदले की भावना : बदले की भावना भी उसमें कूट-कूट कर भरी थी। इसी ने उसे युद्ध करने तथा अंत तक डटे रहने को विवश किया। हालांकि भगवान श्री राम ने उसे समर्पण का बार-बार मौका दिया परंतु वह अपने विवेक से काम ले ही न सका।

7.  लालच : भगवान ब्रह्मा और शिव से कई वरदान प्राप्त करने वाला तथा अष्टसिद्धि एवं नवविधी का स्वामी रावण अपनी उपलब्धियों के अलावा अपने राज्य का विस्तार भी चाहता था तभी तो पहले उसने कुबेर से लंका छीनी और बाद में अपने साम्राज्य को चारों और फैलाना चाहता था। लालच पर काबू पाना उसके बस की बात नहीं थी।

8.  मोह-माया : ठाठ-बाठ की मिसाल लंका, अपार दौलत, अपने परिवार, बेटों एवं बहन से बेपनाह प्यार करने वाला रावण इस मोह-पाश से कभी निकल नहीं पाया। यदि उसका मोह यहीं तक कायम रहता तो उसकी गिनती भी आदर्श पुरुषों में होती।

9. युद्ध प्रिय : बेहद शक्तिशाली होने के कारण वह देवताओं तक से टक्कर ले लेता था। यही नहीं, परिवार में भी वह लड़ाई से झिझकता नहीं था तभी तो विभीषण से भी झगड़ा कर उसे उसने लंका से निकाल दिया था।

10.  अहंकार : गर्व एवं अहंकार में जमीन-आसमान का फर्क है। अपनी समृद्धि, परिवार और शक्ति पर गर्व करना जहां एक गुण है जो जीवन में आगे बढऩे की प्रेरणा देता है वहीं इन सब पर अहंकार तो रावण तक को पतन की राह पर ले गया था।

रावण का उजला पक्ष

शिव भक्त : रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। तुलसीदास रचित ‘रामचरित मानस’ में कहा गया है कि सेतु निर्माण के समय रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना के समय पूजन के लिए उस समय के सबसे बड़े विद्वान रावण को बुलाया गया और शिव भक्त रावण ने शत्रुओं द्वारा कराए जाने वाले पूजन आमंत्रण को भी स्वीकार किया।

तपस्वी : वह इतना महा तपस्वी था कि उसने तप के बल पर देवताओं और ग्रहों को अपने वश में कर लिया था। ब्रह्मा जी से उसने अमरता और विद्वता का वरदान पाया था। अपने तप और भक्ति के बल पर ही वह तंत्र-मंत्र और अस्त्र-शस्त्र सिद्धियों का मालिक बन बैठा था।

विद्वान : वेदों का ज्ञाता और ज्योतिष विद्या में पारंगत रावण, ज्ञान और बुद्धि का भंडार था। दस सिरों वाला यह दशानन इतनी तीक्ष्ण बुद्धि का स्वामी था कि भगवान शिव ने भी आचार्य पंडित के रूप में रावण को अपने यहां बुलाया था।

बहन से प्रेम : रावण बहन शूर्पणखा से बेहद प्यार करता था। लक्ष्मण जी द्वारा बहन की नाक काटे जाने के अपमान का बदला लेने को भी वह आतुर हुआ था और उसने सीता जी का हरण किया था।

हर कला में निपुण : केवल युद्ध कला या ज्योतिष विद्या ही नहीं बल्कि उसने अग्नि बाण और ब्रह्मास्त्र जैसे अचूक शस्त्रों का भी निर्माण किया था। आयुर्वेद और काव्य कला में परिपूर्ण रावण वीणा बजाने में भी सिद्धहस्त था और उसने ‘ रावण हत्था’ नामक एक वाद्य भी बनाया था।

निडर : रावण ने जीवन में किसी से डरना सीखा ही नहीं था। युद्ध में श्री राम, लक्ष्मण जी एवं हनुमान जी जैसे योद्धाओं को देख उसका हौसला एक पल भी नहीं डगमगाया। उसके इन्हीं गुणों की स्वयं भगवान श्री राम ने भी प्रशंसा की थी और मृत्यु-शैय्या पर पड़े रावण से लक्ष्मण जी को जीवन की सीख लेने को कहा।

                                                                                                                                                                       


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You