धुमावती साधना का विधान

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Thursday, October 17, 2013-7:23 AM

जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जला कर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआं निकला,उससे धूमावती का जन्म हुआ इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं यानी धूमावती धुएं के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है। मां धूमावती रोग, शोक और दुख की नियंत्रक महाविद्या मानी जाती हैं। वे शक्तिशाली और प्रभावशाली हैं।

उनकी शरण में आने वाले भक्तों की विपत्तियां दूर होती हैं। धूमावती साधना एक सफल अनुभूत और तीव्र प्रभाव युक्त प्रयोग है। यह केवल एक दिन की ही साधना है और आपकी जो भी इच्छा हो वो भगवती मां पूरी करती है। केवल जटिल परिस्थितियों में आपको यह साधना नौ दिन तक करनी पड़ेगी। धूमावती साधना समस्त प्रकार की तन्त्र बाधाओं की रामबाण काट है। धुमावती साधना का विधान-

1 अग्नि देव को प्रज्वलित करके गोबर के उपले व गुग्गल डाल के धुआं करते रहें,साधना के वक्त लगातार धुआं होते रहना अवश्यक है।

2 शांत स्थान का चयन करें और दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए काले रंग के वस्त्र पहनकर जाप करें। जाप रात्रि 9 से 4 के बीच करें।

3 जाप के पहले तथा बाद मे गुरु मन्त्र की 1 माला जाप करें

॥ ऊं परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम: ॥

4 रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का 11 माला जाप करें

आई आई धूमावती माई ..

सुहाग छेड़े कोण कुले जाई ..

धुआं होय धू धू कोरे .

आमार काज ना कोरले .

शिबर जोटा खोसे भुमिते पोड़े


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