महाकाव्य रामायण के निर्माता वाल्मीकि भगवान

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Friday, October 18, 2013-8:06 AM

सामर्थ्यशाली, सर्वशक्तिमान, महाज्ञानी, परमबुद्धिमान वाल्मीकि भगवान को संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति के नाविक, महाकाव्य रामायण के निर्माता, आदिकवि महर्षि, दयावान व संस्कृत कविता के पितामाह के रूप में जाना व माना जाता है। इस महाकाव्य रामायण में इन्होंने चौबीस हजार श्लोक, एक सौ आख्यान, पांच सौ सर्ग और उत्तरकांड सहित सात कांडों का प्रतिपादन किया है। इस महाकाव्य में महापराक्रम,   लोकप्रियता, क्षमा, सौम्यभाव तथा सत्यशीलता का वर्णन है जो भारतीय संस्कृति, सभ्यता, साहित्य और समाज की अमूल्य निधि है।

दया और अहिंसा का पाठ
दयावान वाल्मीकि भगवान जी ने सर्वप्रथम दुनिया को दया और अहिंसा का पाठ पढ़ाया और शांति का संदेश दिया। वह किसी को भी दुखी नहीं देख सकते थे। एक दिन जब वह तमसा नदी के घाट पर नित्य की तरह स्नान के लिए गए तो पास ही क्रौंच पक्षियों का जोड़ा जो कभी भी एक-दूसरे से अलग नहीं रहता था, विचरण कर रहा था।

उसी समय एक निषाद ने उस जोड़े में से नर पक्षी को बाण से मार डाला। यह देखकर महर्षि का हृदय बहुत दुखी हुआ। उन्होंने निषाद से कहा कि यह अधर्म हुआ है। निषाद तुझे नित्य निरंतर कभी भी शांति न मिले क्योंकि तूने बिना किसी अपराध के इसकी हत्या कर डाली। ऐसा कह कर जब महर्षि ने अपने कथन पर विचार किया तब उनके मन में बड़ी चिंता हुई कि पक्षी के शोक से पीड़ित होकर मैंने क्या कह डाला। अंतत: उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं ऐसे ही श्लोकों में रामायण काव्य की रचना करूं।

सीता को आश्रम ले आना
कुछ मुनि कुमारों ने महर्षि के पास जाकर आश्रम के समीप किसी स्त्री के रोने का समाचार सुनाया। उनकी बात सुनकर महर्षि उस ओर चल दिए। वहां पहुंच कर उन्होंने रघुनाथ जी की प्रिय पत्नी सीता को अनाथों की-सी दशा में देखा। शोक से पीड़ित सीता जी से वह अपनी मधुर वाणी में बोले,"पुत्री तुम राजा दशरथ की पुत्रवधू महाराजा राम की प्यारी पटरानी और मिथिला के राजा जनक की पुत्री हो। मैं जानता हूं कि तुम निष्पाप हो। अत: विदेहनंदिनी, अब निश्चिन्त हो जाओ। इस समय तुम मेरे पास हो। इतना कहकर वह सीता जी को अपने आश्रम में ले आए।"

कुश और लव का जन्म व शिक्षा
भगवान वाल्मीकि जी के आश्रम  में ही सीता जी को दो पुत्र रत्न प्राप्त हुए। महर्षि ने वेदार्थ का विस्तृत ज्ञान करवाने के लिए उन्हें सीता जी के चरित्र से युक्त संपूर्ण महाकाव्य रामायण का अध्ययन करवाया और इसके साथ-साथ गीत-संगीत व अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी।

श्री राम जी के यज्ञ में आगमन
मर्यादा पुरुषोत्तम महाराजा श्री राम तथा बहुसंख्यक महात्मा मुनियों द्वारा भली-भांति पूजित एवं सम्मानित वाल्मीकि महर्षि जी ने श्री राम के यज्ञ में कुश और लव को वीणा की लय पर मधुर स्वर में रामायण गान आरंभ करने का आदेश दिया। इन दोनों बालकों का मधुर गान सुनकर श्री राम को बड़ा कौतूहल हुआ। श्री राम के पूछने पर दोनों बालक बोले कि जिस काव्य के द्वारा आपको संपूर्ण गाथा का प्रदर्शन करवाया गया है उनके रचयिता हमारे पूज्य गुरु भगवान वाल्मीकि जी हैं।

मानवीय जीवन के स्थायी मूल्यों का खजाना
श्रीमद् वाल्मीकि महाकाव्य रामायण विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें मानवीय जीवन के प्रभावशाली आदर्श हैं। इस महाकाव्य में धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक क्षेत्र के समूह संबंधों के आदर्श रूप वॢणत मिलते हैं। भगवान वाल्मीकि जी ने राम कथा के माध्यम से मानव संस्कृति के शाश्वत और स्वर्णिम तत्वों का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जो अनुपम और दिव्य है।

समाज और राष्ट्र को उन्नत तथा स्वस्थ बनाने के लिए व्यक्ति का चरित्र विशेष महत्व रखता है। चरित्र के निर्माण के लिए परिवार के महान योगदान को श्रीमद् वाल्मीकि रामायण ने ही स्वीकार किया है। परिवार एक ऐसा शिक्षा केंद्र है जहां व्यक्ति स्नेह, सौहार्द, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, आस्था एवं समाज के सामूहिक कल्याण के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के त्याग की शिक्षा पाता है। परिवार समस्त मानवीय संगठनों की इकाई है जिसमें जीवन के प्राचीन आदर्शों को सुरक्षित रखा गया है।

महत्वपूर्ण शिक्षाएं व संदेश
भगवान वाल्मीकि जी की शिक्षाओं का महाकाव्य रामायण में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है जिसमें कर्तव्य परायणता, आज्ञा पालन, वचन निभाना, भाई का भाई के प्रति अथाह प्रेम व स्नेह, दुखियों, शोषित व पीड़ितों के प्रति दया और करुणा प्रेम, मानवता व शांति का संदेश देने के साथ-साथ अपने अंदर के अहंकार, ईर्षा, क्रोध व लोभ रूपी राक्षस को मारकर सहनशीलता का परिचय देना शामिल है।

परम बुद्धिमान व महाज्ञानी भगवान वाल्मीकि जी के अनुसार संसार का मूल आधार ज्ञान ही है अर्थात शिक्षा के बिना मानव जीवन व्यर्थ एवं अर्थहीन है क्योंकि जिंदगी की भूल भुलैयां के चक्रव्यूह से शिक्षित व्यक्ति का ही बाहर निकलना संभव तथा आसान होता है। इनकी शिक्षाओं  में अस्त्र-शस्त्र, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति तथा संगीत के अलावा आदर्श पिता, आदर्श माता, आदर्श पत्नी, आदर्श पति, आदर्श भ्राता, आदर्श स्वामी, आदर्श सेवक, आदर्श राजा, आदर्श प्रजा का ही नहीं आदर्श शत्रु का भी वर्णन मिलता है। आज भी इनकी शिक्षाएं पूरी दुनिया को मानवता, प्रेम व शांति तथा सहनशीलता का संदेश देती हैं तथा हिंसा, शत्रुता व युद्ध से होने वाले भयंकर विनाश के दुष्परिणामों से बचने का संकेत कर रही हैं।
                                                                                                                                                             —राजेंद्र अटवाल


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