भगवान की संपत्ति का अधिकारी कौन है?

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Saturday, October 26, 2013-3:14 PM
व्यास जी ने 17 पुराण लिखें, वेदान्त लिखा, महाभारत लिखा, वेद विभाग किया तब भी उन्हें शांति नहीं मिली। यह भी शास्त्र हैं, मंगल प्रद हैं लेकिन परम मंगल उनको तब प्राप्त हुआ जब उन्होंने भागवत लिखी इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु जी कहते हैं कि समस्त शास्त्रों का निचोड़ है श्री मद्भागवत। इसी भागवत श्रवण से वेद व्यास मुनी को परम शांति मिली।

सबसे पवित्रतम शब्द पहले बद्रिकाश्रम में ध्वनित हुआ, गूंजा। वही शब्द शुकदेव जी को मौका व्यास जी से सुनने का। सुनने के बाद वही भागवत सुनाई उन्होंने महाराजा परिक्षित को। वहीं से सूत गोस्वामी जी ने भागवत सुनकर नैमिषारण्यमें सुनाई 60 हजार ऋषियों को। साधक के लिए भागवत में से भक्त चरित्र श्रवण परम मंगलदायक है इसलिए उन्होंने ऐसा आचरण किया कि प्रहलाद चरित, ध्रुव चरित्र एक दो बार नहीं 100 बार सुना।

इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है। इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है।

भागवत धर्म सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है। जो भी भगवान कि सृष्टि में पैदा हुआ है उन सबके कल्याण के लिए भागवत धर्म है जैसे पिता कि संपत्ति अपने सब पुत्रों के लिए होती है वैसे भगवान की संपत्ति धर्म है और उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्रजा के लिए दिया है। श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने वाले मनुष्य का भाग्योदय होता है। जन्म-जन्म के पुण्य उदय होने पर ही वह इसका श्रवण करता है, इसलिए वह सौभाग्यशाली होता है।


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