परमहंस वेदांत केसरी स्वामी निर्मल जी

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Monday, October 28, 2013-2:40 PM

अमृतसर की पावन धरती युगों से अवतारों, ऋषियों, मुनियों, गुरुओं की तपस्थली रही है। भगवान राम जी के चरण कमलों ने इसको पावन किया है। श्री गुरु नानक देव ने ज्ञान-भक्ति रस की गंगा यहां बहाई है और अमृत सरोवर आज विश्व भर को सांझी वालता का मार्ग दिखा रहा है। 19वीं सदी बीतने पर अमृतसर के गांव बच्ची विंड में एक धार्मिक परिवार में माता राधा रानी तथा पिता कृष्ण चंद्र के घर 10 जनवरी 1919 को हमारे नायक राम लाल उर्फ लाल सिंह का अवतरण हुआ।

बालक राम लाल को प्रारंभिक शिक्षा माता द्वारा ही दी गई। पश्चात अपनी बड़ी बहन के पास लाहौर छावनी की एक पाठशाला में प्राप्त की। माता-पिता की धार्मिक वृत्ति का प्रभाव उन पर अत्यधिक पड़ा और एक संस्कृत विद्वान पंडित शिव दयाल  से संस्कृत का अध्ययन शुरू कर दिया और केवल 14 वर्ष की अल्प आयु में ही उसमें महारत हासिल कर ली।

पिछले जन्म के संस्कारों के फलस्वरूप ध्यान योग में प्रवीणता प्राप्त करके आलौकिक ज्योति के दर्शन कर लिए। अध्यात्म का इतना रंग चढ़ा कि सांसारिक चमक-दमक से दूर रह कर साधु का जीवन बिताने लग गए। 18 वर्ष के होने पर वह उस परम सत्ता से बातें करने लग गए और कण-कण में एक ही नूर दिखाई देने लगा। नश्वर तन, नश्वर जगत, माया मोह के जाल से आजाद हो गए और एक वीतराग संन्यासी स्वामी शंकरानंद जी के शिष्य बन कर वेदांत ज्ञान सागर में डुबकी लगानी शुरू कर दी।

गुरु शंकरानंद जी ने उन्हें राम लाल से ‘निर्मल’ बना दिया।‘निर्मल’ जी का आध्यात्मिक ज्ञान से मुखमंडल दमकने लग गया। घर-बार त्याग करके भगवा धोती धारण कर ली और उन्होंने अमृतसर के गांधी पार्क में रोजाना लोगों के सम्मुख वेदांत ज्ञान के मोती बिखेरने शुरू कर दिए। कुदरती तौर पर हृदय में उर्दू शायरी फूट पड़ी और मधुर आवाज में प्रेम भक्ति और अध्यात्म के शे’र पढऩे लगे। कठिन से कठिन आध्यात्मिक विषय को बड़े ही सरल ढंग से समझाने लग गए। अनेक लोग उनसे शांति और मानसिक उल्लास ग्रहण करते।


निर्मल वेदांत निकेतन की नींव
सन् 1950 में उन्होंने माल रोड पर वेदांत निकेतन की नींव डाली और हर वर्ष दीपावली के पावन अवसर पर अखिल भारतीय वेदांत सम्मेलन का आयोजन प्रारंभ कर दिया जिसमें देश भर के महान साधु-संत, वैदिक विद्वानों ने भाग लेना शुरू कर दिया।

ख्याति प्राप्त विद्वानों  की संसद
आधी सदी से अधिक समय से इन सम्मेलनों में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान, तत्ववेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ साधु-संतों के अलावा कई शंकराचार्य और अन्य पंथों के आचार्य भी इस धर्म संसद में भाग ले चुके हैं जिनमें इस्कान के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद जी, स्वामी चिन्मयानंद जी आचार्य रजनीश जी, स्वामी गंगेश्वरानंद जी, स्वामी परमानंद जी, स्वामी हरमिलापी जी, कल्याण के भाई हनुमान प्रसाद, पोद्दार जी, स्वामी  कृपात्री जी, स्वामी आत्मानंद, स्वामी अखंडानंद, स्वामी प्रकाशानंद भी हैं।

स्वामी निर्मल की शिक्षाएं

मनुष्य तू अमृतपुत्र है। उठो जागो  विजयी बनो। मन जीते जग जीत। गुरु ही रहनुमा है, सत्य ही ईश्वर है। यदि तुम ईश्वर की ओर एक कदम भी बढ़ाओगे वह तुम्हारे स्वागत के लिए सात कदम बढ़ेगा।

63वां अखिल भारतीय निर्मल वेदांत सम्मेलन
अध्यक्षता स्वामी ज्ञानदेव सिंह निर्मल भेष शिरोमणि कर रहे हैं तथा उद्घाटन स्वामी दिव्यानंद महाराज ‘भिक्षु’  करेंगे। निर्मल साधना ट्रस्ट की ओर से आश्रम में आधुनिक स्वामी निर्मल चैरीटेबल अस्पताल चल रहा है तथा हर रविवार को फ्री लंगर लगता है।


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