क्या आप स्वंय को झूठे अभिमान से मुक्ति दिलाना चाहते हैं

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Thursday, November 21, 2013-8:52 AM
गुरू और चेला जा रहे थे। चेले को बहुत आश्चर्य हो रहा था कि गुरू महाराज कभी इतने अशांत नहीं रहते हैं आज बात क्या है। गुरू महाराज बार - बार अपने झोले को छू रहे थे। ब्रह्मा में रमण करने वाले ये महापुरूष आज क्यों अशांत हैं?

वे दोनों एक जगह पहुंचे तो उनको प्यास लगी। चेले को गुरू ने कहा कि," मैं हाथ मुंह धोकर आता हूं, तुम इस झोले का ध्यान रखना।"

चेला तो अवसर ही देख रहा था कि गुरूदेव इतने अशांत क्यों हैं ? तो गुरू जब हाथ मुंह धोने के लिए गए तो चेले ने झोले के अंदर देखा तो उस झोले में सोने की ईंट थी। उसने सोचा गुरूदेव की अशांति का कारण यह सोने की ईंट ही है। अत: गुरूदेव के आने से पहले ही चेले ने झोले में से सोने की ईंट निकालकर पास ही बने कुएं में डाल दी तथा ईंट के समान एक पत्थर का टुकड़ लेकर उस झोले में रख दिया।

गुरूदेव जब लौट कर आए तो उन्होंने झोले को बाहर से टटोला और आगे चल दिए लेकिन चलते चलते भी झोले को ही टटोलते रहे। चेले से कहा," आपने चलने की गति थोड़ी तेज करो, रात होने से पहले हमें गंतव्य पर पहुंचना है।"

चेले ने कहा," गुरूदेव हम तो घोर जंगल में रहने वाले ठहरे, आप इतने अशांत क्यों है?"

गुरूदेव ने कहा," ऐसी कोई बात नहीं। अभी गांव कितना दूर है।"

यह सुनकर चेले से रहा नहीं गया और बोला, "गुरूदेव आप चिंता मत करें । आपको अशांत करने वाली वस्तु को मैंने कुएं में डाल दिया है।"

"क्या तो फिर इस झोले में क्या है?"

"इस झोले में उस वस्तु के नाप का और वजन का पत्थर है।"

यह सुनकर गुरूदेव शांत हुए। त्याग और वैराग्य के बिना शांति सफल नहीं हो पाती। किसी का भी त्याग वैराग्य के बिना सुरक्षित नहीं होता है। भीतर ह्रदय में वैराग्य, उसके हाथ का त्याग मौलिक होगा स्वभाविक होगा। मनुष्य संग्रह के कारण महान नहीं बनता वह तो त्याग से महान बनता है। त्याग का अर्थ है उस चीज को छोड़ना जिसे हम पकड़े बैठे रहते हैं। त्याग जीवन में बल लाता है। आत्मा की निर्धपता और तप झूठे अभिमान से मुक्ति दिलाता है।


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