घर से नकारात्मक ऊर्जा भगाएं, सुख-समृद्घि लाएं

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Friday, November 22, 2013-4:53 PM

स्वास्तिक शब्द मूलभूत सु और अस धातु से बना है। सु का अर्थ है अच्छा, कल्याणकारी, मंगलमय और अस का अर्थ है अस्तित्व, सत्ता अर्थात कल्याण की सत्ता और उसका प्रतिक है स्वास्तिक। किसी भी मंगल कार्य के प्रारंभ में स्वस्मितंत्र बोलकर कार्य की शुभ शुरूआत की जाती है। महान र्किर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो," विश्व के ज्ञान स्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो।"

यह आकृति हमारे ऋषि मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व निमित्त की है। एकमेव और अद्वितिय ब्रह्मा विश्व रूप में फैला है यह बात स्वास्तिक की खड़ी और आड़ी रेखा ज्योतिर्लिंग का सूचन करती है और आड़ी रेखा विश्व का विस्तार बताती है। स्वास्तिक की चार भुजाएं यानि भगवान विष्णु के चार हाथ। भगवान विष्णु अपने चार हाथों से दिशाओं का पालन करते हैं।

स्वास्तिक प्राचीन धर्म का प्रतीक है। देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगलमय कामनाएं इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतिक यानि स्वास्तिक। स्वास्तिक सर्वांगी मंगलमय भावना का प्रतिक है। भारतीय संस्कृति की परंपरा के अनुसार विवाह प्रसंगों, नवजात शिशु की छठी के दिन, दिपावली के दिन, पुस्तक पूजन में, घर के प्रवेश द्वार पर तथा अच्छे शुभ प्रसंगों में स्वास्तिक का चिन्ह कुमकुम से बनाया जाता है एवं भावपूर्वक ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि," हे प्रभु! मेरा कार्य निर्विध्न सफल हो और हमारे घर में जो अन्न, वस्त्र, वैभव आदि आए वह पवित्र बनें।"

शरीर को शुद्ध करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए (जिस दिन स्वस्तिक बनाएं) पवित्र भावनाओं से नौ अंगुल का स्वस्तिक 90 डिग्री के एंगल में सभी भुजाओं को बराबर रखते हुए बनाएं। केसर से, कुमकुम से, सिन्दूर और तेल के मिश्रण से अनामिका अंगुली से ब्रह्म मुहूर्त में विधिवत बनाने पर घर के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जाओं का आगमन होता है। स्वस्तिक के अंदर लगभग 1 लाख सकारात्मक ऊर्जाओं का अस्तित्व रहता है।

स्वास्तिक के प्रयोग से निम्न लाभ होते हैं -

1. धनवृद्धि

2. गृह शान्ति

3. रोग निवारण

4. वास्तुदोष निवारण

5. भौतिक कामनाओं की पूर्ति

6. तनाव, अनिद्रा व चिन्ता से मुक्ति

 


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