मन तू जोत स्वरूप है, अपना मूल पहचान

  • मन तू जोत स्वरूप है, अपना मूल पहचान
You Are HereMantra Bhajan Arti
Saturday, November 23, 2013-12:05 PM

हमारे इस मानवीय जीवन में परमात्मा के आभास का ज्ञान हर व्यक्ति अपनी समझ और ज्ञान मात्र से ही कर पाता है। यूं तो परमात्मा के ज्ञान के रास्ते अनेक हो सकते हैं पर मंजिल एक ही है जिस में ज्ञान का रास्ता सर्वोपरि है। जिस प्रकार हमारे सूफी संत सुल्तान बाहू फरमाते हैं:

" दिल ही हुजरा रब्ब सच्चे दा, ऐथे पा फकीरां झाती हूं।

ज्ञान दा दीवा बाल हनेरे तेरी लब पये वस्त गुआची हूं।"

इस तरह प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य विश्वास और विचार की धारा की ओर अग्रसर रहता है और खंडित कर्म कांडों से दूरी बनाए रहने में सक्षम रहता है। जैसे कि परमात्मा का आभास मानवीय जीवन में एक सदीवी तब्दीली लाता है और इस आभास को प्राप्त करने के लिए मानवीय निर्मित संस्थानों में जाने की अनिवार्य नहीं होता। मुझे सुल्तान बाहू का एक और मार्ग दर्शन याद आता है,

"न रब अर्श मुअल्ला मिलिआ,

न रब खाने काबे हू,

न रब इलम किताबी लब्बा,

न रब विच मिहराबे हू,

गंगा तीर्थ मूल न मिलिया,

मारे पैंडे बे हिसाब हू,

जद द मुरशद फड़िआ,

बाहू मेरे मुक गए कुल आजादे हू।"

जिस तरह परमात्मा की खोज बेअंत है, साधारणतया कहा जाता है, " अर्श में तू, फर्श में तू जिसकी पहुंच जहां तलक, उसके लिए वहीं पे तू।" परमात्मा तो कण - कण में समाया है। महसूस करने की आवश्यकता है जैसे कि

हर एक जा पे है तू लेकिन पता नहीं मालूम,

तुम्हारा नाम सुना है निशान नहीं मालूम।

किस कदर बे निआज हो तुम भी दासताने दराज हो तुम भी।

परमात्मा को आध्यात्मिक रूप से महसूस करने के लिए दिलो दिमाग की कुछ खास स्थिति होना अनिवार्य है।

पता यूं तो बता देते हो सब को ला मकान अपना,

ताज्जुब है मगर रहते हो तुम टूटे हुए दिल में।

हैरान हूं मेरे दिल में समाएं हो किस तरह

हालांकि दो जहान में समाते नहीं हो तुम

जैसे कि हमारे पूजनीय संत मसकीन जी फरमाते हैं। मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मखसूस होते हैं। ये वो नगमा है जो हर साज पे गाया नहीं जाता। वैसे तो मानवीय जीवन में परमात्मा का अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान अनुसार अलग हो सकता है जैसे,

" मंदिर, मस्जिद ये मयखाने कोई ये मानें,

कोई वो मानें सब तेरे हैं जाना

आशाने को ये मानें कोई वो मानें।

इक होने का तेरे कायल है इंकार पे

कोई मायल है, असलियत लेकिन तू जानें।

कोई खलक में शामिल करता

कोई सब से अकेला रहता है।

हैं दोनों ही तेरे मस्ताने।"

अन्तत: परमात्मा सर्वोपरि बेअन्त और हर रंग में यक्ता हैं। वो मरकजे जुस्तजु है। आल में रंगों हू हैं। दम बा दम जलवा गर, तू ही तू चार सू हैं। परमात्मा सच्ची भावना और नीयत की परख में निपुण हैं। आओ हम सब मिल के सच्ची नीयत, पाक मन, मानव अग्रसर सोच और मानव सेवा के माध्यम से परमात्मा के मार्ग की ओर कदम बढ़ाएं ताकि हमारे दिलों दिमाग को सुकून मिले और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति हो सके।

अन्तत: मैं भक्त कबीर जी का दोहा आपके समक्ष रखता हूं।

कबीर मानव जीवन दुर्लभ है। होए न बार बार।

जिसका बयान श्री गुरू ग्रंथ साहिब में भी दिया गया है जैसे कि मन तू जोत स्वरूप है, अपना मूल पहचान।

हे कबीर! कहो कि यह आत्मा राम का ही अंश है। अगर मानव राम का ही अंश है और उसके अंदर परमात्मा की ज्योति है तो जीवन उद्देश्य उस जोत का दर्शन मात्र ही है।

- पवनदीप शर्मा


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