एकादशी व्रत का फल हजार यज्ञों से भी अधिक है

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Friday, November 29, 2013-9:32 AM

उत्पन्ना एकादशी का व्रत मार्गशीर्ष मास के कृ्ष्ण पक्ष में किया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृ्ष्ण की पूजा करने का विधान है। व्रतधारी को दशमी के दिन रात में भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन ब्रह्रा बेला में भगवान का पुष्प, धूप, दीप, अक्षत से पूजन करना चाहिए। इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है। इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि

उत्पन्ना एकादशी का व्रत जो जन करता है, वही सभी सुखों को भोगकर अंत में श्री विष्णु जी की शरण में चला जाता है। इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति को सबसे पहले दशमी तिथि की सायं में दातुन और रात को दो बार भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी की सुबह संकल्प एवं नियम के अनुसार कार्य करें। दोपहर को संकल्प पूर्वक स्नान करना चाहिए, स्नान करने से पहले शरीर पर मिट्टी और चंदन का लेप करें और लेप लगाते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए

 अश्व क्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे उवृ्तापि बराहेण कृ्ष्णे न सताबाहुना । मृ्तिके हरमें पाप तन्मया पूर्वक संचितम त्वयाहतेन पापेन गच्छामि परमागतिम ।।

स्नान करने के बाद धूप, दीप, नैवेद्ध से भगवान का पूजन करें। रात को दीपदान करने के उपरांत सतकर्म भक्ति पूर्वक करके जागरण करें।

उत्पन्ना एकादशी व्रत फल

इस विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है, उनको तीर्थ और दर्शन करने से जो पुण्य़ मिलता है वह एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नही़ं है। इसके अतिरिक्त व्यतीपात योग, संक्रान्ति में तथा चन्द्र-सूर्य ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है।

दश श्रेष्ठ ब्राह्माणों को भोजन कराने से जो पुण्य मिलता है। वह पुण्य एकादशी के पुण्य के दसवें भाग के बराबर होता है। निर्जल व्रत करने का आधा फल एक बार भोजन करने के बराबर होता है। इस व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। एकादशी व्रत का फल हजार यज्ञों से भी अधिक है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य था। उसका नाम मुर था। उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके स्थान से गिरा दिया। तब देवेन्द्र ने महादेव जी से प्रार्थना की, " हे शिव-शंकर हम सब देवता मुर दैत्य के अत्याचारों से दु:खित हो, मृ्त्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आप कृपा कर इस विपति से बाहर आने का उपाय बतलाएं।"

शंकरजी बोले," इस समस्या का समाधान केवल श्री विष्णु जी की शरण में जाने से होगा।"

इन्द्र तथा अन्य देवता महादेव जी के वचनों को सुनकर क्षीर सागर जाकर भगवान श्री विष्णु से मुर दैत्य के अत्याचारों से मुक्त होने के लिये विनती करने लगे। श्री विष्णु जी बोले की," यह कौन सा दैत्य है, जिसने देवताओं को भी जीत लिया है।"

 देवराज इन्द्र बोले,"उस दैत्य की ब्रह्मा वंश में उत्पत्ति हुई थी। उसकी राजधानी चन्द्रावती है। उस चन्द्रावती नगरी में वह मुर नामक दैत्य निवास करता है। जिसने अपने बल से समस्त विश्व को जीत लिया और सभी देवताओं पर उसने राज कर लिया। इस दैत्य ने अपने कुल में इन्द्र, अग्नि, यम, वरूण, चन्द्रमा, सूर्य आदि लोकपाल बनाए हैं। वह स्वयं सूर्य बनकर सभी को तपा रहा है और स्वयं ही मेघ बनकर जल की वर्षा कर रहा है। अत: आप उस दैत्य से हमारी रक्षा करें।"

इन्द्र देव के ऐसे वचन सुनकर भगवान श्री विष्णु बोले," देवताओं मैं तुम्हारे शत्रुओं का शीघ्र ही संघार करूंगा। अब आप सभी चन्द्रावती नगरी को चलिए।"

दैत्य और देवताओं का युद्ध होने लगा। जब दैत्यों ने भगवान श्री विष्णु जी को युद्ध भूमि में देखा तो उन पर अस्त्रों-शस्त्रों का प्रहार करने लगे। भगवान श्री विष्णु मुर को मारने के लिये जिन-जिन शास्त्रों का प्रयोग करते वे सभी उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगे़। भगवान श्री विष्णु उस दैत्य के साथ सहस्त्र वर्षों तक युद्ध करते रहे़ परन्तु उस दैत्य को न जीत सके।

 अंत में विष्णु जी शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बद्रियाकाश्रम में एक लम्बी गुफा में शयन करने के लिये चले गए। दैत्य भी उस गुफा में यह विचार कर चला गया कि आज मैं श्री विष्णु को मार कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लूंगा। उस समय गुफा में एक अत्यन्त सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई़ और दैत्य के सामने आकर युद्ध करने लगी। दोनों में देर तक युद्ध हुआ। उस कन्या ने उसको धक्का मारकर मूर्छित कर दिया और उठने पर उस दैत्य का सिर काट दिया। वह दैत्य सिर कटने पर मृ्त्यु को प्राप्त हुआ।

 उसी समय श्री विष्णु जी की निद्रा टूटी तो उस दैत्य को किसने मारा वे ऐसा विचार करने लगे। तभी एक अति सुंदर कन्या के वचन सुनाई दिए वह बोली,"यह दैत्य आपको मारने के लिये तैयार था। तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इसका वध किया है।"

भगवान श्री विष्णु ने उस कन्या का नाम एकादशी रखा क्योंकि वह एकादशी के दिन श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी।


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