इस मंत्र को जपने से जो चाहेंगे प्राप्त कर लेगें

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Wednesday, December 04, 2013-7:31 AM

पौराणिक मान्यता है कि भगवान विष्णु ने श्री सिद्धविनायक गणेश मंदिर में तप कर सिद्धी प्राप्त की। इस सिद्धी के बल से भगवान विष्णु ने सहस्त्र यानि हजार वर्षों तक मधु और कैटभ नाम के शक्तिशाली दैत्यों से युद्ध कर उनका संहार करने में सफल हुए। कथानुसार भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के विचार से ओम अक्षर का लगातार जप किया। जिससे भगवान श्री गणेश उनकी तपस्या प्रसन्न और ब्रह्मदेव को सृष्टि रचना करने की मनोकामना पूरे होने का वरदान दिया।

जब भगवान ब्रह्मदेव सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब भगवान विष्णु को नींद आ गई। शयन की स्थिति में भगवान विष्णु के कानों से मधु और कैटभ नाम के दैत्य बाहर निकले। दोनों दैत्यों बाहर आकर समस्त देवी-देवताओं को पीडि़त करने लगे। तब भगवान ब्रह्मदेव ने देवी-देवताओं से कहा कि," भगवान विष्णु ही इन दैत्यों का संहार करने में सक्षम है।"

भगवान विष्णु भी शयन से जागे और उन्होंने उन दोनों शक्तिशाली दैत्यों को मारने की भरसक कोशिश की, परंतु वह असफल रहे। तब भगवान विष्णु ने युद्ध रोककर गंधर्व का रुप लेकर शिव भक्ति में गाना शुरु किया। तपस्या में लीन भगवान शिव ने जब यह सुनकर तप से जागे। तब भगवान विष्णु ने भगवान शिव से दैत्यों को मारने का उपाय पूछा। तब भगवान शिव ने विष्णु से कहा कि," जब तक वह श्री गणेश का आशीर्वाद प्राप्त नहीं करते उन्हें युद्ध में सफलता नहीं मिलेगी।"

भगवान शिव ने विष्णु को श्रीगणेश का षडाक्षर मंत्र गणेशाय नम: जपने को कहा। जिससे वह जो चाहेंगे प्राप्त कर लेगें। यहां श्री गणेश ने भगवान विष्णु को दर्शन दिए। इस मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु द्वारा किया गया माना जाता है। तब भगवान विष्णु ने भगवान श्री गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए सिद्धक्षेत्र वर्तमान सिद्धटेक को चुना। यहां घोर तप कर उन्होंने श्री गणेश को प्रसन्न किया। भगवान गणेश ने उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया।

तब भगवान विष्णु सिद्धी प्राप्त कर पर्वत की चोटी पर भगवान गणेश का मंदिर बनाया और गजानन की मूर्ति स्थापित की। इसके बाद भगवान विष्णु ने दैत्यों का संहार किया और श्री गणेश के आशीर्वाद से ही ब्रह्मदेव ने निर्विघ्र सृष्टि रचना की। भगवान ब्रह्मदेव की दोनों पुत्रियों को श्रीगणेश ने अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार किया।

ऐसा माना जाता है कि यहां वेद व्यास ने भी पुराणों की रचना से पहले तप किया और भगवान श्री गणेश की प्रसन्नता प्राप्त की। युगान्तर में भगवान विष्णु द्वारा बनाया गया श्री गणेश मंदिर तो नष्ट हो गया। किंतु ऐसा माना जाता है कि एक चरवाहे ने इस स्थान पर भगवान गणेश के दर्शन किए। तब उसने यहां पर भगवान गणेश का पूजन शुरु किया। इसके बाद पेशवा काल में इस नवीन मंदिर का पुन निर्माण हुआ।


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