क्‍या ईश्वर है या केवल हमारी सोच है ?

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Wednesday, December 11, 2013-8:00 AM

महात्मा बुद्ध से एक आगन्तुक ने पूछा,"  ईश्वर है।"

महात्मा बुद्ध दृढ़ता पूर्वक बोले," नहीं ! कहीं नहीं है कभी नहीं था, कभी नहीं होगा।"

दूसरा आगन्तुक बोला," ईश्वर नहीं है इस विषय पर क्या कहते हैं आप।"

महात्मा बुद्ध बोले, " सब जगह खोज डाला मैंने कहीं नहीं मिला मुझे।"

आगन्तुक सिर झुका कर वहां से चला गया। अब दो लोग थे। महात्मा बुद्ध और उनके प्रिय शिष्य आनंद। दोपहर का समय था। महात्मा बुद्ध विश्राम के लिए जाने ही वाले थे तभी एक आगन्तुक ने प्रवेश किया। महात्मा बुद्ध के श्री चरणों में प्रणाम किया और बोला, अगर आप आज्ञा दें तो क्या मैं एक प्रश्न कर सकता हूं।

महात्मा बुद्ध मुस्कराएं बोले," पूछो।"

आगन्तुक बोला, " जहां तक मैं समझता हूं ईश्वर नहीं है। आपका क्या विचार है।"

महात्मा बुद्ध बोले," क्या कहते हो ? ईश्वर ही तो है ईश्वर के सिवाय कुछ भी नहीं है।"

आगन्तुक हैरान होकर बोला," आप कहते हैं कि ईश्वर है परंतु मैंने तो सुना था आप नास्तिक हैं। अब मैं चलता हूं।"

महात्मा बुद्ध को प्रणाम करके वह लौट गया। अभी वह निकला ही था तभी एक और आगन्तुक आया और बोला," मैं एक प्रश्न कर सकता हूं।" 

महात्मा बुद्ध बोले, "पूछो।"

आगन्तुक बोला, " आज ईश्वर विवाद का विषय बन गया है कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर है कुछ कहते हैं कि नहीं है। आपका इस विषय में क्या विचार है।"

महात्मा बुद्ध बोले," जब आप कुछ नहीं कहते हैं तो मैं भी कुछ नहीं कहूंगा।"

आगन्तुक बोला, " मुझे निराश मत करें कुछ तो बोलें।"

महात्मा बुद्ध बोले, " मैं कुछ नहीं कहूंगा अब तुम जाओ।"

आगन्तुक अपने प्रश्न का उत्तर लिए बिना ही वहां से चला गया। आनंद उलझन में आ गया आखिर इन में से कौन सी बात सही है। उसने अपनी जिज्ञासा का हल करने के लिए महात्मा जी से कहा, इन तीनों में से कौन सी बात ठीक है।"

महात्मा बुद्ध बोले,"तुमसे मतलब, न तुमने प्रश्न किए थे न तुम्हें उत्तर दिए गए फिर तुमने सुने क्यों ?"

आनंद बोला, " क्षमा करें प्रभु वार्तालाप मेरे समक्ष हुआ था इसलिए मेरे कानों में पड़ गया और अब मेरे मन में तीव्र जिज्ञासा है।"

महात्मा बुद्ध बोले, " तो सुनो मैंने तीन नहीं केवल एक उत्तर दिया है।"

आनंद बोला," एक।"

महात्मा बुद्ध बोले," एक की मैं तुम्हारे विचार का समर्थन नहीं करूंगा। जिसने कहा ईश्वर है, न तो वह जिज्ञासु था और जिसने कहा ईश्वर नहीं है न ही वो। हां और न के मध्य में झूलने वाला भी जिज्ञासु नहीं था। यह सब अपने अपने विचारों के प्रति आश्वस्त थे। वो मेरे पास जिज्ञासु होकर नहीं आए थे बल्कि अपने मत पर मेरा  समर्थन लेने आए थे। अपने अहंकार को पुष्ट करने के लिए एक युक्ति खोज रहे थे। अपने अहंकार के लिए मेरे विचारों का शोषण कर रहे थे।"

आनंद बोला," आप धन्य हैं प्रभु !"




 


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