कृष्णावतार

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Tuesday, December 24, 2013-9:22 AM

कृष्ण जी सबको ढांढस बांधते, हौसला बांधते, स्वयं भी मेहनत करते और उनकी देखादेखी वे लोग भी काम में आ जुटे जिनके दिल टूट चुके थे। उनकी उपस्थिति लोगों में नए उत्साह का संचार कर रही थी। उनका अपना उत्साह तो अपार था ही।

‘‘भगवान सोमनाथ का मंदिर भी किस स्थिति में बनेगा?’’ भगवान श्रीकृष्ण ने पूछा।

‘‘शत्रुओं ने इसे भी विध्वंस कर डाला।’’ प्रद्युम्र जी ने बताया।

‘‘इस बार हम चांदी का मंदिर बनवाएंगे।’’ श्री कृष्ण ने बताया।
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और फिर द्वारिका का नए रूप में निर्माण हुआ।

प्रद्युम्र जी (श्री कृष्ण और रुक्मिणी के सबसे बड़े पुत्र) बीस वर्ष के थे।  उनके विषय में भी यदि यह कहा जाए कि वह युग पुरुष थे तो कदापि गलत न होगा। यादवों के प्रति उनके हृदय में जो अगाध प्रेम और श्रद्धा थी उसे बस वही जानते थे। बहुत अच्छे और सफल नेता थे वह और धर्म के निधड़क रक्षक।

स्वयं श्री कृष्ण जी की देखभाल में उन्होंने क्षात्र धर्म की बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त की थी। उनके विचार में तो देवताओं और दैत्यों के बीच कभी समाप्त न होने वाला संघर्ष अब भी चल रहा था और उन्हें जो भी शिक्षा मिली थी वह उन्हें भीष्म पितामह जैसा दृढ़ निश्चय वाला धर्म का रक्षक बनाने के लिए ही दी गई थी। आर्यव्रत में हद से ज्यादा साहसी वीर और जोशीले वही थे। इन्हीं आदतों के कारण इस प्रकार की शिक्षा लेते हुए उनके मन में बड़ा उत्साह उत्पन्न होता था।      

(क्रमश:)

 


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