गणपति जी के इस मंत्रोच्चारण से पाएं रिद्धि सिद्धि और ऐश्वर्य

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Wednesday, January 01, 2014-2:18 AM
 श्री गणेश साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं। वह साधारण देवता नहीं, अपितु अनंतकोटि ब्रह्माण्डनायक जगन्नियंता ब्रह्म ही है। गणेश जी चौदह विद्याओं के तथा चौंसठ कलाओं के स्वामी माने जाते हैं। गणेशजी को वंदन करते हुए तुलसीदास जी ने कहा है -

गाइए गनपति जगबंदन , संकर - सुवन भवानी नंदन। ऋद्धि - सदन गजबदन , बिनायक , कृपाह्नसधु सुंदर सब लायक॥ मोदक - प्रिय , मुद - मंगल - दाता , विद्या - वारिधि बुद्धि विधाता। मांगत ' तुलसीदास कर जोरे , बसहि रामसिय मानस मोरे॥

श्रीगणेश शक्ति और शिवतत्व का साकार स्वरूप है। इन दोनों तत्वों का सुखद स्वरूप ही किसी कार्य में पूर्णता ला सकता है। बुधवार को गणपति जी की विशेष पूजा अर्चना करने से आप के जीवन में आए हुए सभी प्रकार के दुख दर्द का नाश होता है, मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है, आयुष्य और बल में वृद्धि होती है और सर्वत्र आप की कीर्ति फैलती है। श्री गणेश अपने भक्तों के समस्त विघ्नों को दूर करने के लिए विघ्नों के मार्ग में विकट स्वरूप धारण करके खड़े हो जाते हैं।

1 जलस्नान कराने से जीवन से दुःख का नाश होता है और सुख का आगमन होता है। जीवन में विद्या, धन संतान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2 सफेद पुष्प अथवा जासुद अर्पण करने से कीर्ति मिलती है।

3 दूर्वा वह है, जो गणेश के दूरस्थ पवित्र को पास लाती है। गणपति को अर्पित की जानें वाली दूर्वा कोमल होनी चाहिए। दुर्वा अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, आर्थिक उन्नति होती है और संतान का सुख मिलता है।

4 सिंदूर अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पूजा करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें-

सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्। शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥

अर्थात- लाल रंग का सिंदूर शोभा, सौभाग्य और सुख बढ़ाने वाला है। शुभ और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। हे देव ! आप इसे स्वीकार करें।

हिंदू धर्म में धूप देने और दीप जलाने का बहुत ज्यादा महत्व है। सामान्य तौर पर धूप दो तरह से ही दी जाती है। पहला गुग्गुल-कर्पूर से और दूसरा गुड़-घी मिलाकर। धूप अर्पण करने से कीर्ति मिलती है। रोग और शोक मिट जाते हैं। भगवान गणेश को मोदक बहुत प्रिय हैं। उनके दिल तक पहुंचने के लिए उन्हें लड्डू अर्पण करें और मनोवांछित फल प्राप्त करें। मोदक की गोल आकृति गोपनियता और महाशून्य का प्रतीक है। शून्य से सब उत्पन्न होता है और शून्य में सब विलीन हो जाता है।

 

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