क्या आप भगवान के दर्शन करना चाहते हैं ?

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Saturday, January 04, 2014-8:01 AM

उच्चकोटी के एक महात्मा थे। किसी शिष्य ने उनसे कहा,"गुरू जी मुझे भगवान का दर्शन कराइए।"

महात्मा ने उठाया डण्डा और कहा," इतने रूपों में भगवान दिख रहा है, उसका तूने क्या सदुपयोग किया? फिर से प्रभु का कोई नया रूप तेरे आगे प्रगट करवाऊं? कितने रूपों में वह गा रहा है कितने रूपों में वह गुनगुना रहा है उसका तूने क्या फायदा उठाया, जो फिर एक नया रूप देखना चाहता है?"

भगवान की भावना करते हो तो भावना बदल सकती है लेकिन एक बार भी भगवान के स्वरूप का ज्ञान हो जाए भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाए तो फिर चलते फिरते, लेते देते, जीते मरते, इस लोक परलोक में सर्वत्र सर्व काल में ईश्वर का अनुभव होने लगता है। आवृति करके पक्का नहीं किया जाता कि मैं आत्मा हूं....  मैं आत्मा हूं.... क्योंकि परमात्मा तो आपका वास्तविक स्वरूप है उसे रटना क्या?

जैसे आपका नाम मोहन है तो क्या आप दिन रात मैं मोहन हूं... मोहन हूं... रटते हो? नहीं, मोहन तो आप हो ही।  ऐसे ही ब्रह्मा तो आप हो ही। अत: यह रटना नहीं है कि मैं ब्रह्मा हूं... वरन इसका अनुभव करना है। परमात्मा के खोने का कभी भय नहीं रहता। रूपए पैसे खो सकते हैं, पढ़ा लिखा आप भूल सकते हो उसको समझने के लिए तत्परता चाहिए। 


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