आइए करें यात्रा भगवान शिव के घर की

  • आइए करें यात्रा भगवान शिव के घर की
You Are HereDharm
Monday, January 27, 2014-10:42 AM

हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा में समुद्र तल से साढे सात हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित देव घाटी भरमौर का सौंदर्य नयनाभिराम है और अतीत गौरवपूर्ण। हमारे पौराणिक ग्रंथों में जिन चार कैलाश पर्वतों का उल्लेख आया है, उनमें से एक मणि महेश कैलाश, इसी नैसर्गिक घाटी में स्थित है।

चंबा शहर से भरमौर की दूरी कोई पैंसठ किलोमीटर है। भरमौर का रास्ता खडा मुख से होकर जाता है। खडा मुख और भरमौर के बीच रावी नदी बहती है। भरमौर कई तरह के फलदार वृक्षों से सजी एक ऐसी मनोरम घाटी है, जहां कदम रखते ही सारी थकान पल भर के लिए छू-मंतर हो जाती है। यह घाटी वर्ष में तकरीबन पांच मास बर्फ की सफेद चादर से ढंकी रहती है।

भरमौर का जिक्र प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है और जन श्रुतियों में भी। भरमौर का प्राचीन नाम ब्रह्मपुर है। उसे पांच सौ वर्षों तक चंबा राज्य की राजधानी रहने का गौरव भी हासिल है। भरमौर निवासियों की यह मान्यता है कि कालांतर में भगवान शिव यानी नटराज ने भरमौर घाटी में तांडव नृत्य भी किया था। भरमौर निवासियों के अनुसार नटराज सात तरह के तांडव नृत्य करते हैं-आनंद तांडव, संध्या (प्रदोष) तांडव, कालिका तांडव, त्रिपुर दाह तांडव, गौरी तांडव, संहार तांडव और उमा तांडव।

भारत ही नहीं, अनेक पाश्चात्य पुरातत्ववेताओं को भी भरमौर ने अपने गौरवपूर्ण अतीत की तरफ आकर्षित किया है। इनमें डॉ. हटचिनसन,डा. फोगल,हरमनगोटस के नाम उल्लेखनीय हैं। शिखर शैली में बना मणि महेश का विशाल मंदिर यहां के निवासियों और शैव मतावलंबियों के लिए आस्था का प्रतीक है। आबादी के बीच एक बडे मंदिर परिसर में शिखर और पहाडी शैली में बने बीसियों छोटे छोटे शिव मंदिर हैं और शिवलिंग भी।

मंदिर समूह में सबसे बडा और ऊंचा मणि महेश मंदिर ही है, जिसका शिखर दूर से ही दिखाई देने लग जाता है। विद्वानों ने इस मंदिर का निर्माण काल राजा मेरुवर्मन (780 ई.) के समय का माना है। इस काल में मेरुवर्मन ने भरमौर में अन्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना की थी। कहा जाता है कि भरमौर (ब्रह्मपुर) में चौरासी सिद्धों ने धूनी रमाई थी और जहां-जहां वे बैठे थे, उन्हीं जगहों पर राजा साहिल वर्मा ने चौरासी मंदिरों का निर्माण करवाया था। यह मंदिर शिल्प व वास्तुकला का अनुपम उदाहरण हैं।

मणि महेश मंदिर में प्रवेश करते ही नंदी की भव्य कांस्य प्रतिमा ध्यान आकर्षित करती है। नृसिंह भगवान का मंदिर शिखर शैली का बना है। इस मंदिर में नृसिंह भगवान की अष्टधातु की मूर्ति ग्यारह इंच ऊंचे तांबे की पीठ पर प्रतिष्ठित है। एक हजार से अधिक वर्ष पुरानी इन प्रतिमाओं पर वक्त की धूल जमी नहीं दिखाई देती, बल्कि इनकी चमक-दमक अभी तक बरकरार है और बडी श्रद्धा से इन्हें पूजा जाता है।

भरमौर घाटी का दूसरा प्रसिद्ध शिव मंदिर हडसर में है। हडसर जिसे स्थानीय बोली में हरसर भी कहा जाता है, पवित्र मणि महेश को जाने वाली सडक पर अंतिम गांव है और कैलाश पर्वत के दर्शनार्थ जानें वाले श्रद्धालुओं की विश्राम स्थली भी है। गांव में पहाडी शैली में लकडी से निर्मित भगवान शिव का ऐतिहासिक मंदिर है।

भरमौर घाटी का तीसरा प्रमुख मंदिर छतराडी में है, जिसका निर्माण भी राजा मेरुवर्मन ने करवाया था। मंदिर में अष्टधातु की बनी आदि शक्ति की कलात्मक मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस बहूमूल्य मूर्ति का निर्माण काल छठी-सातवीं शताब्दी का है। मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है। कुछ लोग इसे हिमाचल का अमरनाथ कहकर भी पुकारते हैं।

भारत के उत्तर-पश्चिम में यह सबसे बडा शैव तीर्थ है और इसे भगवान शिव का वास्तविक घर माना गया है। समुद्र तल से 18,564 फुट की ऊंचाई पर स्थित मणि महेश के आंचल में करीब दो सौ मीटर परिधि की झील है। प्रति वर्ष भाद्र पक्ष मास में कृष्णाष्टमी तथा जन्माष्टमी को यहां विशाल मेला लगता है।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You