...तो मिट जाएगा मृत्यु का डर

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Thursday, March 06, 2014-7:59 AM

नचिकेता के पिता उसे यमराज को दान में दे आए। वह क्रोध में आकर कहते हैं कि," हे पुत्र! मैंने तुझे यमराज को दान में दे दिया है।"

जब वह यमराज के द्वार पर पंहुचता है तो तीन दिन तक यमराज यमलोक में न थे। अत: वह द्वार पर खड़ा होकर उनका इंतजार करने लगा। जब यमराज वापिस आते हैं तो उन्हें पता चलता है कि ऋषि पुत्र यमलोक के द्वार पर तीन दिन से खड़ा है।

वे स्वयं चलकर ऋषि पुत्र के पास जाते हैं और कहते हैं कि," ऋषि पुत्र! आप तीन दिन से मेरे द्वार पर खड़े होकर मेरी प्रतिक्षा कर रहे हो। अब आप मुझ से कोई तीन वरदान मांग लें।

नचिकेता पहला वरदान मांगता है कि," मेरे पिता को मेरे से बिछुड़ने का जो दुख हो रहा है उसे दूर कर दें।"

यमराज बोले, "तथास्तु! ऐसा ही होगा। अब दूसरा वरदान मांगो।"

नचिकेता दूसरा वरदान मांगता है," मेरे पिता के दुख को सुख में बदल दो। उनकी सभी व्याधियों को दूर कर दो।"

यमराज वह भी मान लेते हैं। तीसरे वरदान के रूप में वह मांगता है कि," मुझे आत्मा का बोध करा दो जो अजन्मी है। यह शरीर मरता है पर आत्मा तो कभी मरती नहीं। उस आत्मा का मुझे बोध करवाओ।"

यमराज उसे समझाते हैं कि," नचिकेता संसार की माया तू मांग लें पर तू आत्मज्ञान की बात मुझ से मत कर।"

नचिकेता अपनी बात पर अडिग रहता है। वह कहता है, हे यमराज! संसार के सारे सुख दुखों के मूल हैं। मुझे तो आत्मा का बोध करा दो।"

यमराज नचिकेता को समझाते हैं कि," हे नचिकेता! आत्मा को जानने के दो ही मार्ग हैं। जो आत्मा को ऊंचा बना देता है वह है श्रेय मार्ग और जो आत्मा का पतन करता है वह प्रेय मार्ग है। अगर तू आत्मा का उत्थान करना चाहता है तो तू भगवान के सच्चे नाम को जान। भगवान के सच्चे नाम को जान कर तू अपनी आत्मा का उत्थान कर सकता है। अपनी आत्मा को तू रथी बना और अपने मन रूपी घोड़ों को लगाम लगा और आत्मा के ज्ञान को तू प्राप्त कर।"

यही बात अनादिकाल से महान पुरूष समझाते आ रहें हैं। जो ज्ञान यमराज ने नचिकेता को दिया वह ज्ञान समय समय पर महानपुरूष संसार में आ कर देते हैं कि हे मनुष्य! संसार की कोई भी चीज अंत समय में साथ जाने वाली नहीं है। जब जीवन में प्रकाश सब ओर से लुप्त हो जाए और अंधकार में इन्सान को कुछ न सूझे तो उस समय आत्मा की ज्योति सर्वोपरि होती है। हमारी आत्मा हमें विपत्तियों में, तनाव में, पथरीले मार्ग पर व हर मोड़ पर सदैव सच्चा रास्ता दिखाने को तत्पर रहती है। आत्मा जैसा निश्चल, स्वच्छ, शुभ्र प्रकाश इस पृथ्वी में अन्य कहीं भी विद्यमान नहीं है।  

जब आत्मा का स्वरूप समझ में आ जाएगा तो जीवन की सभी पहेलियां सुलझ जाएंगी। आत्मा कभी भी मरती नहीं है, लेकिन जब तक आप आत्मभाव में नहीं आ जाते, आपको मृत्यु का डर बना रहेगा। जब मृत्यु के बारे में सभी तथ्य पता चल जाएंगे, तो मृत्यु का डर गायब हो जाएगा।

    
   


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