इस मिनी भारत में पूरी होती हैं मन की मुरादें

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Tuesday, March 18, 2014-9:33 AM

विश्व के धार्मिक मानचित्र पर श्री माता वैष्णो देवी की यात्रा अपना एक विशेष स्थान रखती है। प्रतिवर्ष 1 करोड़ तक यात्रियों का आगमन ही इस बात का पुख्ता सबूत है कि आदिशक्ति के इस दरबार का जनसाधारण के मन में भावनात्मक रूप में कितना ऊंचा स्थान है।

जम्मू के समीप त्रिकुटा पर्वतमाला में स्थित श्री माता वैष्णो देवी जी की इस महापवित्र गुफा का संबंध चाहे आज से लगभग 750 वर्ष पूर्व भक्त श्रीधर की एक कथा से जोड़ा जाता है, परंतु एक मान्यतानुसार विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ में भी इस त्रिकुटा पर्वतमाला के बारे में धार्मिक पक्ष का वर्णन किया गया है। इतना ही नहीं, पौराणिक काल में भी इसका वर्णन मिलता है। जब कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले भगवान श्री कृृष्ण ने पांडव पक्ष के प्रमुख योद्धा अर्जुन को आदिशक्ति मां भगवती से आशीर्वाद प्राप्त करने का आदेश दिया, तो अर्जुन ने अपनी प्रार्थना में देवी को जम्बू (वर्तमान जम्मू) के समीप पर्वतों की ढलानों पर निवास करने वाली शक्ति के रूप में संबोधित किया। इससे स्पष्ट होता है कि पांडवों को उस समय भी त्रिकुटा पर्वतमाला में मां शक्ति की मौजूदगी का आभास था।

एक मान्य कथा के अनुसार देवी का जन्म त्रेता युग में दक्षिण भारत के ‘रामेश्वरम’ अथवा श्री रामापुरम क्षेत्र में एक राजकन्या के रूप में हुआ। वह एक अत्यंत गंभीर, सूझवान तथा आध्यात्मिक कन्या थीं और बड़ी होकर उन्होंने घोर तपस्या हेतु त्रिकुटा पर्वतमाला की ओर प्रस्थान किया जो हिमालय पर्वत की पवित्र तथा सौम्य पर्वतमाला मानी जाती थी। यहां देवी ने इतनी गंभीर तपस्या की कि युगों के युग बदल गए। ‘कलियुग’ के समय में आदिशक्ति ने त्रिकुटा पर्वत माला की ढलानों पर स्थित इसी गुफा में स्वयं को ‘पिंडी’ रूप में प्रकट किया। इस गुफा में देवी के चरणों में गंगा रूपी जल प्रवाहित हो गुफा में जाता रहा तथा यहां भगवान शिव का शिवलिंग, श्री गणेश, सूर्यदेव, कामधेनु के अलावा कई देवी-देवताओं के चिन्ह भी विद्यमान हैं।

मान्यतानुसार मां पार्वती के आशीष का तेज इस गुफा पर पड़ता है जिसकी आराधना में 33 करोड़ देवता सदा लगे रहते हैं। एक 750 वर्ष प्राचीन मान्य कथानुसार कटड़ा के समीप ‘भूमिका’ नामक स्थान पर देवी माता के भंडारे का आयोजन किया गया। इस भंडारे में भक्त, साधुजन तथा आसपास के गांवों के लोग शामिल थे। उस भंडारे का आयोजन जिस सात-आठ वर्ष की एक दिव्य कन्या की प्रेरणा से किया गया था, वह किसी कारण भंडारे के ही दौरान वहां से चली गई। इस हादसे से भक्त श्रीधर त्रस्त हो उठे, वह कई दिनों तक उस बालिका की तलाश में इधर-उधर इतना भटके कि उन्हें भूख-प्यास किसी भी चीज की सुध न रही। आखिर उनकी अगाध श्रद्धा तथा अविचलित भक्ति देखकर मां भगवती ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर अपनी गुफा का मार्ग दिखाया तथा भक्त श्रीधर अपने स्वप्न में दिखे कुछ स्थानों को पहचानते हुए देवी माता की गुफा तक पहुंचे।

पुराने समय में देवी का दर्शन काल कंधौली की पहाडिय़ों के रास्ते से होते हुए फिर ‘देवा माई’ के प्राकृतिक नजारों से सटे पर्वतों से होकर भूमिका मंदिर के ठहराव से शुरू होकर बाण गंगा के समीप बनी ‘दर्शनी ड्योढ़ी’ से जाता था। फिर बीसवीं शताब्दी की शुरूआत के बाद त्रिकुटा पर्वतों पर कच्चे रास्ते तथा कुछ एक पड़ावों पर सीढिय़ों का निर्माण करवाया गया।

सन् 1986 में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की स्थापना के बाद श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा यात्रा का संचालन किया जा रहा है। गत दो अढ़ाई दशकों में तो 100 करोड़ लोगों के दिलों की राजधानी श्री माता वैष्णो देवी में श्रद्धालुओं को सुविधाएं उपलब्ध करवाने तथा विकास का एक जोरदार दौर चल पड़ा है। जम्मू से लेकर कटड़ा, अर्धकुंवारी तथा भवन एवं बेहतरीन आवासीय सुविधाएं सामान्य दरों पर उपलब्ध हैं। भवन तक बेहतरीन मार्ग पर जगह-जगह शौचालय तथा खाद्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं श्रद्धालुओं के धूप तथा बारिश से बचाव हेतु रेनशैल्टरों की भी व्यवस्था है। जो यात्रा पहले अति दुर्गम मानी जाती थी अब उसे लगभग एक करोड़ श्रद्धालु प्रतिवर्ष पूरा करते हुए अपने मन की मुरादें पाने के अलावा मानसिक शांति भी महसूस करते हैं।

श्री माता वैष्णो देवी की इस यात्रा में जोकि मुख्यत: पैदल अथवा खच्चरों पर की जाती है विभिन्न प्रांतों के इतने लोग आते हैं, जिसे देख कर यहां एक ‘मिनी भारत’ का आभास होता है।

                                                                                                                                                                     —रजनीश खोसला


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