श्री राम नवमी: अपना उद्धार कर जीवन सफल बनाएं

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Monday, April 07, 2014-11:02 AM

मर्यादाओं का पालन करने की बात जहां भी आती है, वहीं अयोध्या के राजा श्री राम स्वत: स्मरण हो जाते हैं। पूरा संसार उन्हें मर्यादा पुुरुषोत्तम के नाम से जानता है क्योंकि उन्होंने मर्यादाओं का सदैव ध्यान रखा, उनका पालन किया, चाहे कितनी भी विषम स्थिति आई, मर्यादाओं का पालन करने में वह कभी चूके नहीं और मर्यादाओं का घोर उल्लंघन करने वाले दशानन रावण से युद्ध में उसे पराजित करके मर्यादाओं की पुन: स्थापना की।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्री राम चंद्रमा के समान अति सुंदर, समुद्र के समान गंभीर और पृथ्वी के समान अत्यंत धैर्यवान थे और इतने शील सम्पन्न थे कि दुखों के सागर में जीने के बावजूद वह कभी किसी को कटु वचन नहीं बोलते थे। वह अपने माता-पिता, गुरुजनों, भाइयों, सेवकों, प्रजाजनों अर्थात हर किसी के प्रति अपने स्नेहपूर्ण दायित्वों का निर्वाह करते थे। माता-पिता के प्रति कर्तव्यपालन एवं आज्ञा पालन की भावना तो उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। उनकी कठोर से कठोर आज्ञा का पालन करने के लिए वह हर समय तत्पर रहते थे।

यदि भगवान श्री राम के सम्पूर्ण जीवन पर एक दृष्टि डाली जाए तो उसमें कहीं भी अपूर्णता दृष्टिगोचर नहीं होती क्योंकि उनके जीवन में जिस क्षण जिस कार्य को करना चाहिए था, उन्होंने वैसा ही कार्य किया। श्री राम रीति, नीति, प्रीति तथा भीति सभी के सम्पूर्ण ज्ञाता व मर्मज्ञ थे। इसी कारण श्री राम परिपूर्ण हैं और आदर्श हैं। श्री राम ने अपने जीवन में नियमों का पालन करके त्याग करके एक आदर्श स्थापित किया।

भगवान श्री राम का जीवन वास्तव में त्यागमय जीवन था। श्री राम सबका आदर करते थे, इसलिए वह महान कहलाए। भगवान श्री राम जो भी करते थे, दूसरों के लिए करते थे, उनके कारण किसी को क्लेश न हो, इसका वह सदैव ध्यान रखते थे। रामायण में भगवान श्री राम के दो रूप हैं-पहला परब्रह्म रूप और दूसरा पुरुषोत्तम रूप। भगवान श्री राम का परब्रह्म रूप तो मन वाणी से अगोचर है, उसके विषय में तो वेदों ने भी नेति-नेति कहा है। उसका अनुभव तो योगीजन समाधि में करते हैं, वह विचार का विषय नहीं, अनुभव का विषय है।

विचारणीय विषय तो उनका पुरुषोत्तम रूप है। मनुष्य रूप धारण करके उन्होंने जो लीलाएं कीं, वे मनुष्य चरित्र का सर्वोत्तम आदर्श हैं। श्री राम अपने भाइयों में बड़े थे, अत: छोटों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसका आदर्श उन्होंने बाल्यकाल से ही प्रस्तुत किया। भरत जी जब भी खेल में हारने लगते, तब श्री राम कुछ ऐसा करते, जिससे भरत जीत जाते और वह स्वयं प्रसन्न होते।

भगवान श्री राम ने सदैव गुरुजनों व माता-पिता की आज्ञा का दृढ़ता के साथ पालन किया। पिता की आज्ञा से ही वह महॢष विश्वामित्र के साथ पहली बार वन गए, वहां राक्षसी ताड़का का वध किया। ऋषियों की हड्डियों का ढेर देख कर द्रवित हो उठे और जब जाना कि यह कार्य राक्षसों ने किया है तो तत्क्षण प्रण लिया कि मैं इस धरा को राक्षसों से हीन कर दूंगा।

युवराज श्री राम के पराक्रम, साहस व वीरता से महॢष विश्वामित्र अत्यंत प्रभावित हुए थे। उस समय श्री राम व उनके छोटे भाई लक्ष्मण सुकुमार ही थे, लेकिन गुरु वशिष्ठ द्वारा दी गई शिक्षा-दीक्षा में वह अत्यंत प्रवीण थे। महर्षि विश्वामित्र ने भी उनकी पात्रता को परख कर व उन्हें अवतार जानकर उन्हें बला-अति बला विद्या का ज्ञान दिया। वन में महर्षि के आश्रम में श्री राम व लक्ष्मण ने उनके यज्ञों की रक्षा की और यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षसों का संहार किया। इसके बाद वे महर्षि  विश्वामित्र के साथ जनकपुरी गए, जहां राम-सीता का विवाह हुआ।

विवाह उपरांत जब राजा दशरथ गुरु की आज्ञा से श्री राम का राज्याभिषेक करना चाहते थे, तो पूरी अयोध्या नगरी खुशी से झूम उठी, लेकिन रात भर में ही ऐसा घटनाचक्र बदला जिसके कारण पिता के वचनों को पूरा करने के लिए उन्हें 14 वर्षों के लिए वनवास को जाना पड़ा। वनवास जाने की खबर सुन कर वह दुखी नहीं हुए बल्कि प्रसन्न हुए कि उन्हें वन में ऋषियों का सान्निध्य मिलेगा और उनके छोटे भाई भरत को राज्य मिलेगा। वन में श्री राम के साथ उनकी भार्या सीता व अनुज लक्ष्मण भी गए। अपने राजसी वस्त्रों को त्याग कर बिना किसी साधन-सामग्री के उन्होंने वन के लिए प्रस्थान किया। सबने उन्हें बहुत रोका, लेकिन वह नहीं माने।

श्री राम के वन जाने के बाद पुुत्र वियोग में राजा दशरथ के प्राण चले गए। पिता के प्राण त्यागने की खबर पाकर जब श्री राम के छोटे भाई भरत व शत्रुघ्न अपने नाना के घर से आए और स्थिति को जाना तो अपने भाई को मनाने के लिए नंगे पैर वन की ओर गए लेकिन श्री राम नहीं लौटे। भरत श्री राम से अत्यंत प्रेम करते थे। वह श्री राम के परम भक्त थे। लेकिन जब श्री राम नहीं माने तो उनकी चरण पादुका लेकर वापस आए और उन्हें ही राज सिंहासन पर रख दिया और तपस्वी की तरह जीवन जीते हुए राज्य का कार्यभार संभालते रहे।

वन में प्रभु श्री राम का सामना अनेक राक्षसों से हुआ, जिनका उन्होंने संहार किया। दैवी योजना के अधीन वह वन में आए ही इसलिए थे कि वन में रहने वाले राक्षसों का संहार हो, लेकिन श्री राम के जीवन में एक ऐसी भी घड़ी आई, जब राक्षसों के राजा दशानन रावण ने उनकी भार्या सीता का हरण कर लिया। तब सीता की खोज में उन्होंने वन में रहने वाले वानरों की सेना बनाई, ये कोई साधारण वानर नहीं बल्कि देवताओं के अंश रूप थे, जो उनकी सहायता करने के लिए आए थे। वानरों की सहायता से श्री राम ने रावण को पराजित किया, रावण के पूरे राक्षस वंश का सर्वनाश हुआ और सीता जी के साथ सकुशल वे अयोध्या नगरी आ गए और राजा बने।

भगवान श्री राम ने अपने जीवन में तप को बहुत महत्व दिया। वन में रहते हुए उन्होंने तपस्वी जीवन को अंगीकार किया और राजा बन कर भी प्रजा के हितों के लिए एक तपस्वी की तरह कष्ट सहते रहे। वह पिता की भांति अपनी प्रजा का पालन करते थे, उनके राज में किसी को किसी भी प्रकार का दुख कष्ट नहीं था, इसलिए उनके राज्य को राम राज्य कहा जाता है। राम राज्य का मतलब ही है ऐसा राज्य जिसमें दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को भी नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रह कर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

आज भी मनुष्य जाति भगवान श्री राम को राजा राम के रूप में याद करती है क्योंकि भगवान श्री राम ने केवल अयोध्या में ही नहीं बल्कि सभी के हृदयों पर राज किया था।

भगवान विष्णु के पूर्णावतार होते हुए भी उन्होंने मर्यादाओं की सीमा में रह कर अपना जीवन-निर्वाह किया और एक आदर्श जीवन जिया। उनके जीवन में अनगिनत कष्ट आए लेकिन मर्यादाओं का पालन करने में वह कभी भी विचलित नहीं हुए। वे अत्यंत धैर्यवान, पराक्रमी, ज्ञानी, मधुरभाषी, सत्यभाषी, नीति कुशल, साहसी आदि गुणों की खान थे। उनके गुणों की महिमा अनंत है, जिसका वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी अपने को असमर्थ पाते हैं।

 राम-नाम की महिमा व्यापक है। श्री राम की भक्ति की महिमा का कोई पार नहीं है, जिससे राम भक्त हनुमान उनके चरणों की सेवा करके असंभव कार्य करते हैं। इस तरह रामनवमी का पर्व, जिसे हम सभी भगवान श्री राम के जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं, वह हमें यह संदेश देता है कि हम भी भगवान श्री राम की तरह आदर्श जीवनशैली का निर्वाह करें, मर्यादाओं का पालन करें, गुणों को धारण करें और श्री राम नाम की भक्ति से अपने जीवन को सफल करें।


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