स्वयं को परखें इस कसौटी पर, जानें कितने विद्वान हैं आप

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Friday, November 18, 2016-3:24 PM

कालिदास एक बार भ्रमण करते-करते एक गांव में पहुंच गए। बहुत प्यास लगी थी तो एक घर के द्वार पर जाकर पानी मांगा। वहां मौजूद स्त्री और अपने ज्ञान के चलते ख्याति अर्जित कर चुके कालिदास के बीच रोचक संवाद हुआ। एक नजर इसी संवाद पर-

 

कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए, बड़ा पुण्य होगा।


स्त्री बोली- बेटा, मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो, मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।


कालिदास- मैं मेहमान हूं, कृपया पानी पिला दें।


स्त्री- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसार में 2 ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ, कौन हो तुम?


कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें। 


स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो 2 ही हैं। पहली धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ, तुम कौन हो?


कालिदास बोले- मैं हठी हूं।


स्त्री ने कहा- फिर झूठ। हठी तो 2 ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण, कौन हैं आप?
(कालिदास पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)


कालिदास ने फिर कहा-फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।


स्त्री फिर बोली- नहीं, तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख तो 2 ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए गलत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।


(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे।)


माता ने कहा- उठो वत्स। (आवाज सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थीं, कालिदास पुन: नतमस्तक हो गए।)


माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया तथा अहंकार कर बैठे इसलिए तुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए यह स्वांग करना पड़ा।


कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वह आगे चल पड़े।


सीख: विद्वता पर कभी घमंड न करें, यही घमंड विद्वता को नष्ट कर देता है।


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