मंदिरों की नगरी खजुराहो में है कला और सौन्दर्य का संगम, तस्वीरों में देखें

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Friday, November 25, 2016-9:25 AM

खजुराहो बुन्देलखण्ड में स्थित एक ऐसा स्थल है जो अतीत के स्वर्णिम साध्य के साथ वर्तमान के सामने गौरवपूर्ण मुद्रा में खड़ा है। निर्माण कला की दृष्टि से खजुराहो के मंदिरों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक- पूर्ववर्ती, जिसके अन्तर्गत चौसठ योगिनी लालगुहा महादेव, ब्रह्मा मातंगेश्वर और वराह मंदिर आदि आते हैं। दूसरा- परवर्ती, जिसमें शेष सभी मंदिर आते हैं। चंदेल वंश के राजाओं ने कुल पचासी मंदिर बनवाए थे, जिनमें से वर्तमान में केवल बाइस मंदिर शेष बचे हैं ।

 

मतंगेश्वर मंदिर
चंदेला राजाओं के द्वारा बनवाए गए मंदिरों में मतंगेश्वर ही पहला मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण हर्षवर्धन ने 920 ई. के लगभग करवाया गया था। खजुराहो के पुरातन मंदिरों में यही एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें आज भी पूजा-पाठ होता है। यह खजुराहो का पवितत्रतम मंदिर है।

 

चौसठ योगिनी मंदिर 
चौसठ योगिनी मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण चंदेल राज्यवंश के अस्तित्व में आने के लगभग 300 वर्ष पूर्व हुआ था। इस मंदिर की यहां उपस्थिति इस बात को प्रमाणित करती है कि चंदेलों के अस्तित्व में आने से पहले यहां तंत्र-दर्शन का बहुत प्रभाव था क्योंकि ‘चौसठ योगनियों’ की पूजा तांत्रिकों के द्वारा ही की जाती थी, यह मंदिर पूर्णतः लावा पत्थर का बना हुआ है ।

 

ललगुंआ मंदिर
चौसठ योगिनी मंदिर के समीप ही पश्चिम दिशा की ओर लालगुंआ सागर के किनारे भगवान शिव का ललगुंआ मंदिर बनाया गया है। यह एक साधारण आकार का पश्चिमाभिमुखी मंदिर है, जिसमें शिखर पिरामिड आकार का है। वर्तमान में गर्भग्रह पूर्णतः खाली पड़ा है तथा मंदिर के सामने नंदी की एक सुंदर प्रतिमा है ।

 

वराह मंदिर
वराह मंदिर लावा पत्थर की ऊंची नींव पर काफी ऊंचाई पर बालू पत्थर का आयताकार मण्डप के रूप में बना हुआ है। इस मंदिर में भगवान विष्णु को वराह रूप में दिखलाया गया है। वृहत एवं एक ही पत्थर की बनी हुई 2.6 मीटर लंबी इस प्रतिंमा की विशेषता इसके ऊपर बनी छोटी अनगिनत देव-देवियों की प्रतिमाएं हैं। यह वराह भगवान के उस रूप को दर्शाती है जब वे हिरणाक्ष नामक राक्षस को मार कर पृथ्वी को पाताल से निकालकर लाए थे।

 

देवी जगदंबा मंदिर
देवी जगदंबा मंदिर चित्रगुप्त मंदिर के समान ही निरंधार शैली से बना हुआ है। इस मंदिर का निर्माण गण्डदेव वर्मन ने किया था। मूलतः यह मंदिर विष्णु भगवान का था। लेकिन बाद में लगभग 1830 ई. में महाराज छतरपुर ने मनियागढ़ से पार्वती की मूर्ति यहां लाकर स्थापित की इसलिए इस मंदिर को जगदंबा मंदिर कहा जाता है।

 

शिव मंदिर    
जगदंबा मंदिर के समीप ही महादेव का एक छोटा सा मंदिर है। इसके प्रवेश द्वार पर शिव की प्रतिमा है। मंदिर का छोटा सा चबूतरा ही प्रतिमा है। मंदिर का छोटा सा चबूतरा ही देखने योग्य है। जिसमें रखी प्रतिमा में चंदेला राजवंश के प्रथम राजा चंदवर्मन को सिंह से लड़ते हुए दिखलाया गया है। यह चिह्न अशोक चिह्न की तरह चंदेला राज्य वंश का राजकीय चिह्न था। 

 

ब्रह्मा मंदिर 
पूर्वी मंदिर समूह के अंतर्गत लगभग तीन मीटर ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा गांव की ओर जाने पर रास्ते में बाईं ओर पड़ती है। इस प्रतिमा को श्रद्धालुओं ने सिंदूर से रंग दिया है। इस प्रतिमा का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इस पर 922 ई. का शिलालेख है जो कि खजुराहो में प्राप्त सभी शिलालेखों से प्राचीन है। ब्रह्मा मंदिर लगभग 900 ई. में बनाया गया था। इस मंदिर के अंदर चतुर्मुखी शिवलिंग है। शिवलिंग के चार मुखों के कारण ही मंदिर का नाम ब्रह्मा मंदिर पड़ गया है ।

 

वामन मंदिर    
वामन मंदिर निरंधार शैली का महत्वपूर्ण मंदिर है। इस मंदिर का प्रवेश द्वार या अर्धमण्डप टूटा हुआ है। महामण्डप एवं गर्भगृह अच्छी स्थिति में है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की वामन रूप में अद्भुत प्रतिमा है।

 

खखरामठ अवशेष रूप में वामन मंदिर के उत्तर पूर्व में समीप ही स्थित है। एक टूटे से चबूतरे एवं कुछ स्तम्भों के यहां अवशेष मिलते हैं, यह मंदिर खजुराहो में स्थित एक महायानी बुद्धिष्ठ मंदिर था। इसके गर्भगृह में प्राप्त मूर्ति अब पुरातत्व संग्रहालय के प्रमुख कक्ष में देखने को मिलती है। बुद्ध की यह प्रतिमा भूमि स्पर्श ध्यान मुद्रा में है।

 

जवारी मंदिर     
जवारी मंदिर वामन मंदिर के पास दक्षिण की ओर भगवान विष्णु का मंदिर है। यह अपने छोटे स्वरूप के होते हुए भी अपनी सुंदरता एवं कुछ विशेषताओं के लिए उल्लेखनीय है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा है जिसका सिर खण्डित है। प्रतिमा भगवान विष्णु के वैकुण्ठ रूप को प्रदर्शित करती है।

 

घण्टाई मंदिर
घण्टाई मंदिर खजुराहो गांव के बाहर की ओर आने वाले दक्षिण रास्ते पर स्थित है । यह मंदिर अपने स्तम्भों पर अंकित सुंदर घंटियों जो कि सांकलों से लटकी हुई दिखाई गयी है के कारण घण्टाई मंदिर के नाम से जाना जाता है। अब यह खण्डहर मात्र रह गया है। 

 

जैन मंदिर
खजुराहो में जैन मंदिरों का समूह है। जिसमें मुख्यतः आदिनाथ,, पार्श्वनाथ व शांतिनाथ मंदिर है एवं इसके साथ-साथ कुछ अन्य छोटे-छोटे मंदिर भी बने हुए हैं। जैन मंदिर समूह के प्रांगण से निकलते ही दांईं ओर इस नवनिर्मित संग्रहालय में जैन मंदिरों के खण्डहरों से प्राप्त मूर्तियों को परिचय के साथ प्रदर्शित किया गया है। यह नवीन संग्रहालय आधुनिक स्थापत्य कला का एक सुंदर उदाहरण है।

 

दक्षिण मंदिर समूह के अंतर्गत दूल्हादेव मंदिर खजुराहो में चंदेल राज्यवंश के द्वारा बनवाए शिव मंदिरों में सबसे नया है। इसका निर्माण 1100 से 1150 ई. के मध्य में हुआ था। मंदिर के गर्भगृह में सहस्त्रमुखी शिवलिंग है अर्थात इस शिवलिंग पर 1000 छोटे-छोटे शिवलिंग अंकित हैं । 

 

चतुर्भुज मंदिर     
चतुर्भुज मंदिर निरंधार शैली का बना हुआ मंदिर आकृति की दृष्टि से छोटा मंदिर है, इसके गर्भगृह में भगवान शिव की चार भुजाओं की प्रतिमा अभयमुद्रा में दक्षिण मूर्ति शिव को दर्शाती है। एक ही पत्थर की बनी हुई यह प्रतिमा की ऊंचाई 2.7 मीटर है जो कि अपने मुखमण्डल के भावों के लिए एवं शरीर की त्रिभंगा स्थिति के लिए दर्शनीय है।

 

इसी प्रकार अन्य मंदिरों में खजुराहो की चंदेल कला का स्पष्ट अंकन देखने में आता है, कुछ और मंदिर हैं जैसे पार्वती, चौप्रताल आदि भी प्रमुख हैं। कला और सौन्दर्य का संगम यह अपूर्व सौन्दर्ययुक्त मंदिरों की नगरी न केवल आत्मिक सौन्दर्य से ओतप्रोत है वरन भारतीय इतिहास का एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसे देखकर देश-विदेश से आए अनेक पर्यटक दांतों तले अंगुली दबा लेने को विवश हो जाते हैं।
    

खजुराहो, महोबा से 55 कि.मी. व हरपालपुर से 99 कि.मी. व छतरपुर से 46 कि.मी. पूर्व की ओर सतना से 120 कि.मी. व पन्ना से 43 कि.मी. पश्चिमोत्तर दिशा में है। मध्य रेलवे के झांसी-मानिकपुर शाखा पर 85 कि.मी. दूर हरपालपुर, छतरपुर, सागर और महोबा से बस द्वारा सतना रेलवे स्टेशन से पन्ना होते हुए खजुराहो बस द्वारा पहुंचा जा सकता है। इण्डियन एयर लाइंस कारपोरेशन की प्रतिदिन हवाई सेवा दिल्ली से आगरा होते हुए खजुराहो तक जाने के लिए उपलब्ध है। खजुराहो में पर्यटकों के ठहरने के लिए अनेक होटल, लॉज व धर्मशालाएं उपलब्ध है ।
ज्योति प्रकाश खरे


 


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