बांग्लादेश: 167 विद्रोही सैनिकों को मौत की सजा

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Tuesday, November 05, 2013-4:20 PM

ढाका: बांग्लादेश की एक अदालत ने अद्र्धसैन्य बलों के 167 पूर्व सैनिकों को वर्ष 2009 की बगावत के दौरान 57 सैन्य अधिकारियों समेत कुल 74 लोगों की हत्या का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है। तीसरी अतिरिक्त मेट्रोपोलिटन सत्रीय अदालत के न्यायाधीश मोहम्मद अख्तरूजमां ने फैसला सुनाया, ‘इन्हें फांसी पर लटकाया जाएगा।’ इस मामले को दुनिया का सबसे बड़ा आपराधिक मुकदमा माना जा रहा है।

न्यायाधीश ने राजधानी ढाका में खचाखच भरी अदालत को बताया, ‘अत्याचार इतने जघन्य थे कि मृत लोगों के शवों को भी उनके अधिकार नहीं दिए गए।’ 846 आरोपियों में से 26 आम नागरिक थे। अदालत ने 158 विद्रोही सैनिकों को उम्रकैद और 251 अन्य आरोपियों को 3 से 10 साल तक की कैद की सजा सुनाई। अदालत ने 242 आरोपियों की नरसंहार में कोई संलिप्तता न मिलने पर उन्हें बरी कर दिया। मुख्य विपक्ष बीएनपी के पूर्व सांसद नसीरूद्दीन अहमद पिंटू और आवामी लीग के नेता व पूर्व बीडीआर सैनिक तोराब अली को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

बांग्लादेश राइफल्स के लगभग 823 पूर्व सैनिकों को अस्थायी अदालत कक्ष में पहले लाया गया था। वे लोग सत्रीय न्यायाधीश के सामने बेंचों पर लंबी पंक्तियों में शांतिपूर्वक बैठकर फैसले का इंतजार कर रहे थे। कुछ पीड़ितों के परिवार भी अदालत में मौजूद थे। पुराने ढाका में बनी अस्थायी अदालत की सुरक्षा बहुत कड़ी थी। एक हजार से ज्यादा पुलिसकर्मी और अपराध -रोधी रैपिड एक्शन बटालियन इसकी सुरक्षा में तैनात थी। मुख्य सरकारी वकील अनीसुल हक ने पहले कहा था, ‘आरोपियों, गवाहों और मारे गए लोगों की संख्या के मामले में यह संभवत: विश्व का सबसे बड़ा आपराधिक मुकदमा है।

इसमें यह बात अद्भुत है कि इस मामले की सुनवाई देश के सामान्य कानून के तहत सामान्य मुकदमे की तरह ही की गई।’ ढाका के तत्कालीन सत्र न्यायाधीश जोहुरूल हक ने 5 जनवरी 2011 को बांग्लादेश राइफल्स (बीडीआर) के पूर्व सैनिकों के खिलाफ सुनवाई की प्रक्रिया शुरू की थी। बगावत के दुष्प्रभाव से उबरने के लिए शुरू किए गए अभियान के तहत बीडीआर का नाम बदलकर बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) रख दिया गया था। इन सैनिकों ने यह विरोध प्रदर्शन सैनिकों की उच्च अधिकारियों के साथ होने वाली वार्षिक बैठक या दरबार के दौरान किया था। उनका पहला शिकार तत्कालीन बीडीआर प्रमुख मेजर जनरल शकील अहमद बने थे।

ये हत्याएं तीन दिन की बगावत के दौरान सिर्फ पिल्खाना में ही हुईं। जबकि ढाका के बाहर विद्रोही सैनिकों ने आदेशों को मानने से इंकार कर दिया था और शस्त्रागार की कमान अपने हाथ में ले ली थी। वे अपने सैन्य कमांडरों को अंदर बंद करके खुद बैरकों से बाहर आ गए थे। यह बगावत प्रधानमंत्री शेख हसीना की नई सरकार के लिए एक चुनौती के रूप में आई थी। पिछले साल 20 नवंबर को 11 अद्र्धसैनिक अदालतों द्वारा 57 बगावती इकाइयों के खिलाफ फैसले सुनाए जाने के बाद बांग्लादेश ने सुनवाई का एक बड़ा चरण पूरा कर लिया था। इन फैसलों में विद्रोही सैनिकों के खिलाफ सात साल तक की कैद की सजा सुनाई गई थी । ये सजाएं अपेक्षाकृत नरम बीडीआर कानून के तहत एक समानांतर सुनवाई प्रक्रिया के बाद सुनाई गईं।

सभी आरोपियों पर बगावत की योजना बनाने, बगावत के दौरान अपने अधिकारियों को प्रताडि़त करने और उनकी हत्या करने, उनका सामान लूटने और उनके परिवार के सदस्यों को बंदी बनाने के आरोप थे। इस दौरान इन लोगों ने आठ नागरिकों के साथ आठ बीडीआर सैनिकों की भी हत्या कर दी थी। ये सैनिक इस बगावत के खिलाफ थे। 57 सैन्य अधिकारियों के अलावा उन्होंने सेना के एक सैनिक को भी मार डाला था। इतनी बड़ी संख्या में आरोपी होने की वजह से प्रशासन को एक अस्थाई विशेष अदालत संकुल बनाना पड़ा था क्योंकि इतनी सारे आरोपी असल अदालत कक्ष में नहीं आ सकते थे।

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