आतंकवादियों के साथ मेरे कंधार जाने के निर्णय का आडवाणी को पता था: जसवंत

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Friday, November 01, 2013-9:15 AM

नई दिल्ली: भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के दावे को खंडन करते हुए पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने कहा है कि 1999 में इंडियन एयरलाइंस के हाइजैक किए गए विमान में बंधक यात्रियों को छोडऩे के बदले में रिहा किए गए तीन आतंकवादियों के साथ कंधार जानेे के उनके विवादास्पद फैसले के बारे में तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी को जानकारी थी।

हालांकि जसवंत ने कहा कि आडवाणी और अरुण शौरी, दोनों तत्कालीन मंत्रियों ने फैसले का विरोध किया था जो उन्होंने खुद लिया था और कैबिनेट को सूचित किया था। जसवंत सिंह से जब पूछा गया कि क्या आडवाणी को निर्णय के बारे में जानकारी थी तो उन्होंने एक न्यूज एजेंसी से कहा, ‘‘वह कैबिनेट की बैठक में थे।’’

तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी ने दावा किया है कि उन्हें जसवंत के आतंकवादियों के साथ जाने के फैसले के बारे में जानकारी नहीं थी। जसवंत सिंह ने अपनी नयी पुस्तक ‘इंडिया एट रिस्क’ में उक्त घटनाक्रम के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने निर्णय लिया। मैंने कैबिनेट को सूचित किया कि मैं जा रहा हूं। कैबिनेट ने मुझसे नहीं कहा। इसलिए मैं गया।’’ हालांकि किताब में उन्होंने इस बारे में उल्लेख नहीं किया कि विवादास्पद फैसला कैसे लिया गया।

जब जसवंत से पूछा गया कि क्या उन्हें अपने इस फैसले पर अफसोस है जिसकी काफी आलोचना हुई है, उन्होंने साफगोई से कहा, ‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं।’’

जसवंत सिंह ने पुस्तक में लिखा है कि तीन आतंकवादियों को रिहा करने का फैसला लेना उनके जीवन का सबसे ज्यादा अपेक्षाओं वाला और भावनात्मक तौर पर सर्वाधिक थकाउ समय था। उन्होंने लिखा है, ‘‘पहले तो मैं किसी भी तरह का समझौता करने के खिलाफ था। बाद में जैसे जैसे धीरे धीरे दिन गुजरता गया, मेरा मन बदलने लग गया।’’

साल 1999 में 24 दिसंबर को इंडियन एयरलाइंस के काठमांडो से दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाले विमान का अपहरण कर लिया गया था और 1 जनवरी, 2000 को तीन आतंकवादियों को रिहा करने के बदले में विमान में बंधक बनाये गये यात्रियों को छोडऩे के साथ इस संकट का समाधान निकला।

जसवंत सिंह ने पुस्तक में लिखा, ‘‘तीन आतंकवादियों के सामने 161 पुरष, महिलाएं और बच्चे। इस परिस्थिति के बारे में फैसला लेना कठिन था। क्या यह सही होगा? गलत होगा? क्या समझौता होगा?’’

कंधार जाने के अपने निर्णय के कारण बताते हुए तत्कालीन विदेश मंत्री ने कहा कि उन्हें लगा कि उस वक्त मौके पर रहना उनकी जिम्मेदारी थी जब 161 बंधक यात्रियों के बदले तीन आतंकवादियों को छोड़ा जाएगा ताकि अंतिम समय में कोई अवरोध नहीं हो। उन्होंने कहा, ‘‘मैं विवेक काटजू के संपर्क में था। हम शर्तों पर सहमत हो गए।’’ काटजू उस वक्त विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव और पाकिस्तान-अफगानिस्तान विभाग के प्रभारी थे।


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