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‘सर्वोच्च न्यायालय ने नौकरशाहों को लोक सेवा का निर्देश दिया’

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Monday, November 04, 2013-2:41 PM

नई दिल्ली: सरकार में ऊंचे पद पर रह चुके सेवानिवृत्त नौकरशाहों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में कहा था कि लोक सेवकों का एक निश्चित न्यूनतम कार्यकाल होना चाहिए और उन्हें नेताओं के मौखिक तुगलकी फरमान पर काम करने की जगह शासन में सुधार और प्रणाली में व्यापक जवाबदेही लाने के जरिए सार्वजनिक हित में सेवा करनी चाहिए।

पूर्व मंत्रिमंडलीय सचिव टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि निश्चित न्यूनतम कार्यकाल एक मौलिक जरूरत है और कई आयोगों ने पूर्व में सिफारिश की है। सुब्रह्मण्यम ने आईएएनएस से कहा, ‘‘स्थानांतरण के कुछ तौर तरीके होने चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश का शासन के लिए निहितार्थ हैं। इस मुद्दे का अब एक पृथक रूप लोगों के इसमें शामिल हो जाने के कारण है। इसे हालांकि राजनेता बनाम नौकरशाही का रंग नहीं दिया जाना चाहिए।’’

वर्ष 1996 से 1998 के बीच मंत्रिमंडल सचिव रह चुके सुब्रह्मण्यम उन पूर्व नौकरशाहों में से एक हैं जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर ऐसे सुधार किए जाने की मांग की थी जिससे नौकरशाही में अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप का निषेध सुनिश्चित हो सके।

सुब्रह्मण्यम ने कहा कि अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया गया ‘क्योंकि प्रशासन की गुणवत्ता में गिरावट आ चुकी है।’उन्होंने कहा कि कई अवसरों पर राजनीतिक नेता नौकरशाहों को जवाबदेही लिए बगैर निर्देश देते हैं। लिखित निर्देश पर जोर से व्यापक जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिल सकेगी। सुब्रह्मण्यम ने कहा, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश अब देश का कानून बन चुका है। इसके अनुपालन में आनाकानी अदालती प्रक्रिया की अवमानना मानी जाएगी।’’
 

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