चुनावों में हार के बाद नववर्ष में कांग्रेस के सामने होगी करो या मरो की स्थिति

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Sunday, December 29, 2013-3:08 PM

नई दिल्ली: वर्षांत में हुए विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस जहां एक ओर लोकसभा चुनावों की दौड़ में काफी पिछड़ी नजर आ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी उसकी मुश्किलें और बढा रहे हैं। राहुल गांधी के लिए वर्ष की शुरुआत तो बहुत अच्छी रही थी जब उन्हें वर्ष के शुर में जयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाया गया था लेकिन वर्ष 2013 के समाप्त होने के साथ ही उनके पास अब दिखाने के लिए कुछ नहीं बचा है।

 

पार्टी को अब यह निर्णय लेना है कि एआईसीसी की आगामी बैठक में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए या नहीं। कांग्रेस के संचालन में जब पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी पीछे की सीट पर आ गई हैं तो ऐसे में दिल्ली, छत्तीसगढ, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार ने संसदीय चुनावों में पार्टी को तीसरी बार जीत दिलाने की राहुल की काबिलियत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

हालांकि राहुल ने अब पार्टी और इसकी कार्यप्रणाली में कल्पना से परे बदलाव लाने का संकेत दिया है और साथ ही ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सोनिया गांधी करो या मरो के आगामी मुकाबले की तैयारी के मद्देनजऱ संगठन में फिर से आगे की सीट पर आएंगी।  एआईसीसी की 17 जनवरी को होने वाली बैठक में पार्टी की उस रणनीति की झलक मिलने की उम्मीद है जिसे अपनाकर वह लोक सभा चुनावों में उतरेगी। कांग्रेस संप्रग गठबंधन के प्रमुख के तौर पर मई 2004 से सत्ता में है। पार्टी के कई नेता चुनावों में पार्टी के नेतृत्व के लिए राहुल को ‘स्वाभाविक चयन’ बताकर उनका समर्थन कर रहे हैं। ऐसे में बैठक इन अटकलों के बीच होगी कि कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर सकती है।

 

सोनिया गांधी ने कहा है कि पार्टी सही समय पर प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार के बारे में निर्णय लेगी। हालांकि 2013 में कांग्रेस को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा पर लगे भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद के आरोपों का फायदा मिला और राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा विरोधी मतों के कारण पार्टी सात वर्ष बाद फिर सत्ता पर काबिज हुई। कांग्रेस को संसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित कराने में सफलता मिली।

 

पार्टी वर्ष के अंत में मुख्य विपक्षी दल भाजपा की मदद से लोकपाल विधेयक भी पारित कराने में सफल रही। कांग्रेस और भाजपा दोनों बड़े दलों को दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उदय से झटका लगा है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप ने कांग्रेस के समर्थन से राष्ट्रीय राजधानी में सरकार बनाई है। नई पार्टी के उदय ने कई क्षेत्रीय दलों का मनोबल उंचा कर दिया है। लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात उसे दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में मिली हार है। शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली में 15 वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी को 70 में से मात्र आठ सीटों पर जीत मिली।

 

राजस्थान में भी पार्टी ने न केवल सत्ता गंवाई बल्कि उसे 200 सदस्यीय विधानसभा में मात्र 21 सीटों पर जीत मिली जो राज्य में उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। इस हार से पार्टी इतनी स्तब्ध थी कि मुख्यमंत्री के तौर पर पार्टी का नेतृत्व करने वाले अशोक गहलोत ने कहा कि उनके पास शब्द ही नहीं है क्योंकि राज्य में पार्टी और सरकार विरोधी कोई लहर नहीं है। जब राहुल गांधी की काबिलियत पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, ऐसे में नरेंद्र मोदी भाजपा की मुहिम का नेतृत्व करने वाले सबसे आक्रामक नेता के रूप में उभरे हैं।

 

हालांकि आंध्र प्रदेश का विभाजन पेचीदा मसला है, लेकिन कांग्रेस ने इन उम्मीदों के बीच पृथक तेलंगाना के गठन का निर्णय लिया कि नववर्ष में नया राज्य गठित हो सकता है। आंध्र प्रदेश में वाई एस जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व में वाईएसआर कांग्रेस ने कांग्रेस की मुश्किलें बढा दी हैं। भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी पाए जाने के बाद पार्टी सदस्य रशीद मसूद से राज्यसभा की सदस्यता छीन लिए जाने का अपमान भी कांग्रेस को सहना पड़ा है। विवादों के कारण केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा। साल के अंत में पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी इस्तीफा सौंप दिया।


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