दिल्ली रैन बसेरों में नशेडिय़ों का कब्जा

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Monday, January 20, 2014-12:51 AM

नई दिल्ली (अशोक चौधरी) : सरकार के रैन बसेरों में बाहर से आए मुसफिरों के लिए रात बिताने के लिए जगह नहीं है। नशेडिय़ों का कब्जा होने के कारण लोग सड़क  पर ही रात गुजारने के लिए मजबूर हैं। सुरक्षा के इंतजाम न होने की वजह से वहां जाने से घबराते हैं।
 
जरूरतमंदों के लिए बनाए गए इन रैन बसेरों में स्मैकियों की वजह से भी लोग नहीं जाते हैं। उन्हें डर सताता रहता है कि कहीं असमाजिक तत्व उनकी दिन भर की कमाई पर हाथ साफ न कर जाएं। निजामुद्दीन रेलवे लाइन के पास अपने आठ साल के बच्चे व पति के साथ दिल्ली में ठिठुरती रातें बिताने वाली रेखा का कहना है कि वह पति के साथ रेलवे लाइन के पास सोना मुनासिब समझती है, क्योंकि रैन बसेरों में महिलाओं के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

वहीं बिहार से आए सुमित का कहना है कि वह दिल्ली में रिक्शा चलाकर अपनी अजीवीका चलाता है। रात को दिल्ली सरकार के रैन बसेरों में ठहरता है। लेकिन, रैन बसेरों में किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं है। जमीन पर पड़े पतले-पतले गद्दे हैं। ओढऩे के लिए जो कंबल हैं, वो भी बेहद पतले और चुबने वाले हैं।

 दिल्ली सरकार द्वारा दी जाने वाली दवा भी नहीं नहीं आती। वहीं हाल ही में यूपी के एक गांव से आए चेतन का कहना है कि रैन बसेरों में सिर्फ पहले से ही ठहरे लोगों ने अपना कब्जा जमा रखा है। नए लोगों को तो उनसे डर कर रहना पड़ता है।

रातभर सताता है स्मैकियों का डर:
गुजरात से दिल्ली में रोजी-रोटी की तलााश में आए केतन का कहना है कि दिल्ली सरकार द्वारा बनाए गए रैन बसेरों में रहने से अच्छा है कि वह अपने रिक्शा पर ही रात बिता ले। क्योंकि रैनबसेरों में तो सिर्फ स्मैकियों का ही कब्जा है। जो दिन भर की गाढ़ी कामाई पर तो हाथ साफ करते ही हैं, साथ ही विरोध करने पर जानलेवा हमला करने तक से गुरेज नहीं करते।

 यूपी के बागपत जिला से आए राकेश का कहना है कि दिल्ली एक मंहगा शहर है। उसकी इतनी औकात नहीं कि वह किराये का मकान लेकर रह सके। इसीलिए वह अक्सर रैन बसेरा में अपनी रातें गुजारता है। पैसों की चोरी के डर से वह अपनी दिन भर की कमाई को किसी पेड़ के नीचे या किसी सूनसान जगह छुपा आता है। क्योंकि अनेकांें बार स्मैकियर्स उसकी दिन भर की गाढ़ी कमाई चुरा चुके हैं।

...केजरीवाल साहब को सुना तो बहुत है
इलाहाबाद से अपनी बहू का इलाज कराने के लिए आए अपाहिज राम तीरथ (62) का कहना है कि उन्हें रैनबसेरों में अव्यवस्था जगह की कमी और स्मैकियों की दबंगई के चलते अपनी 10 साल की पोती और 12 साल के पोते के साथ रैन बसेरे के बाहर ही रात बितानी पड़ती है। बेटा बहू के साथ ही अस्पताल में रहता है।

ठंड, हवा और ओस में देर रात हड्डियां कंपकंपा देने वाली ठंड में पोती और पोते की हालत देखकर हर रात उसे खून के आंसू रोना पड़ता है। राम तीरथ ने कहा है कि केजरीवाल साहब को बहुत सुना है, वह आम आदमी के साथ होने का बहुत दम भरते हैं। लेकिन रैन बसेरों में आकर देखो तो सच्चाई इसके उलट है।


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