नक्सली मामले में देश का खुफिया तंत्र फेल

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Friday, March 21, 2014-11:07 AM

नई दिल्ली (कुमार गजेन्द्र)भारत में नक्सलवाद की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन लगातार सरकारें बदलने के बावजूद हुकुमरानों ने इस समस्या को निपटाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया है। हालात यह हैं कि देश में बीते तीन दशक के भीतर नक्सली हमलों में तीन हजार से अधिक जवान शहीद हो चुके हैं।

नक्सलियों द्वारा 1980 के दशक में जहां यह हमले तलवार, फरसों व देशी बमों से किए जाते थे, वहीं अब नक्सली हमलों के लिए अत्याधूनिक हथियारों व लैंड माइन जैसे विदेशी विस्फोटकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बात का खुलासा सोसल एक्टिविस्ट वेदपाल द्वारा गृह मंत्रालय में लगाई गई एक आरटीआई के जवाब से हुआ है। आरटीआई के मुताबिक नक्सलियों का पहला हमला 1980 में जगदलपुर इलाके में सामने आया था।

इस हमले में 84 स्थानीय निवासी मारे गए थे, जबकि 17 नक्सलियों की मौत हुई थी। इसके बाद नक्सलवाद की यह आग पूरे इलाके में फैलती गई। सूत्रों की मानें तो झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, बंगाल, उडि़सा और बिहार में फैलता चला गया। केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से नक्सलवाद को कंट्रोल करने के लिए इन इलाकों में सेना को अर्धसैनिक बलों के अलावा वहां सेना को तैनात किया गया, लेकिन इन सबके बावजूद नक्सलियों के हौसले लगातार बुलंद होते गए हैं। नक्सलियों के हमलों में बीते तीन दशक के भीतर सेना, सीआरपीएफ और अन्य अर्धसैनिक बलों के तीन हजार से भी अधिक जवान शहीद हो चुके हैं।


इसके अलावा इन हमलों में 11 हजार 5 सौ 42 आम नागरिक भी मारे जा चुके हैं। इतना ही नहीं नक्सली हमलों को अंजाम देने और सेना व जवानों पर हमलों के दौरान 4 हजार 6 सौ 38 नक्सली भी मारे जा चुके हैं। आंकड़ों की मानें तो इन हमलों में अब तक दर्जनों वीवीआईपी भी मारे जा चुके हैं। तीन दशक में नक्सली करीब तीन दर्जन से अधिक बार हमलों को अंजाम दे चुके हैं। यह आंकड़ा 30 जून 2013 तक का है।
हैरान कर देने वाली बात यह भी रही है कि हमारे देश का खुफिया तंत्र नक्सली ठिकानों का पता लगाने की बात तो दूर की कौड़ी है, इस बात का पता भी नहीं लगा पाया है कि नक्सलियों को आखिर इतने अत्याधूनिक हथियार कहां से सप्लाई किए जा रहे हैं?

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