नहीं हो पा रही तिहाड़ से नेतागीरी

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Tuesday, April 01, 2014-3:56 PM

नई दिल्ली : वह दिन कुछ और था, जब जेल में रहकर भी चुनाव लड़ा जाता था। जेल में बंद कैदियों को वोट देने का भले ही अधिकार न हो, लेकिन कुछ समय पहले तक लोकसभा, विधानसभा से लेकर निगम पार्षद तक के चुनाव के दौरान तिहाड़ जेल में भी इनकी चुनावी चमक दिखती थी। जेल में बंद कैदी चुनाव मैदान में प्रत्याशी बन, भाग्य आजमाते थे।

 तिहाड़ प्रशासन की मानें तो 2  लोकसभा चुनाव को छोड़ दें, तो पहले कई लोकसभा व विधान सभा चुनाव में कैदियों ने प्रत्याशी बनकर अपना भाग्य अजमाया। इससे चुनाव के दौरान जेल में बंद कैदियों का वर्चस्व बना रहता था और जेल में चुनावी चकल्लस होती रहती थी। 

सूत्रों की मानें तो 2009 से पहले तिहाड़ जेल में बंद लगभग 10 कैदी लोकसभा व अन्य चुनाव के लिए पर्चा भरे थो। हालांकि, इनमें से अधिकांश चुनाव हार गए थे, फिर भी जेल में इनकी चुनावी जुगलबंदी होती रहती थी।

अधिकारियों की मानें तो आखिरी बार 2009 के विधानसभा चुनाव में तिहाड़ जेल से 2 कैदियोंं ने अपना पर्चा भरा था। इनमें बिशन पहलवान व  मंजीत सिंह शामिल हैं। दोनों चुनाव में हार गए, लेकिन दोनों ने चुनाव मैदान में तिहाड़ का चुनावी आकर्षण बनाए रखा।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश 

2 साल से अधिक सजा मिलने वाले कैदियों को चुनाव नहीं लडऩे के सुप्रमी कोर्ट के निर्देश का असर, इस बार के विधान सभा में देखने को तो मिला ही, लोकसभा चुनाव में कोर्ट का निर्देश असर देखने को मिला। जिससे लोकसभा चुनाव के दौरान तिहाड़ जेल का चमक फीकी दिख रही है। 

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