सुषमा की राह पर स्मृति

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Wednesday, April 02, 2014-3:52 AM

नई दिल्ली: किसी ने सच ही कहा है कि राजनीति में न तो किसी का कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही दुश्मन। समय के साथ इनके रिश्ते बदलते रहते हैं। राहुल के खिलाफ अमेठी से भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी के साथ भी कुछ ऐसा ही है।

नरेन्द्र मोदी को लेकर आज स्थितियां बिल्कुल उलट हैं। स्मृति अब मोदी की खास सिपहसालार बन गई हैं और उन्हें अमेठी से राहुल के खिलाफ लड़ाने में भी मोदी की अहम भूमिका रही है। यही नहीं आज पार्टी में भी उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। पार्टी के अहम और महत्वपूर्ण मामलों में उनका दखल पार्टी के कद्दावर नेताओं जैसा हो गया है। कमोबेश स्मृति सुषमा की राह पर चल पड़ी हैं। कुछ साल पहले भाजपा में जो भूमिका सुषमा स्वराज की थी, वह अब स्मृति ले रही हैं और बड़ी तेजी से सुषमा के आगे बढऩे से पार्टी में खाली जगह को भर रही है। भाजपा में उनकी हैसियत और काबलियत का नमूना तब देखने को मिला था जब गोवा में मनोहर पाॢरकर के मुख्यमंत्री बनाने के अभियान को उन्होंने बड़े शानदार तरीके से संभाला था। हालांकि अमेठी से राहुल के खिलाफ उनका चुनाव जीतना आसान नहीं है क्योंकि अमेठी गांधी परिवार की परम्परागत सीट है और वहां के लोग भी गांधी परिवार के भक्त हैं। उनका मानना है कि यदि गांधी परिवार का सदस्य यहां से सांसद बनेगा तो क्षेत्र का फायदा होगा।

ऐसे में स्मृति का वहां से चुनाव जीतना आसान नहीं है लेकिन अगर वह चुनाव हार भी जाती हैं तो इसका उनके राजनीतिक कद पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वह वर्तमान में राज्यसभा की सांसद हैं और इस बात की भी पूरी संभावना है कि यदि राजग की सरकार बनी तो महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जा सकता है। कुल मिलाकर स्मृति को अच्छा प्लेटफार्म मिल गया है, जो उनके करियर को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।

कभी मोदी की धुर विरोधी थीं
पूर्व मिस इंडिया और ‘सास भी कभी बहू थी’ नामक धारावाहिक से सुॢखयों में आने वाली स्मृति ईरानी कभी नरेंद्र मोदी की धुर विरोधी रही हैं। ईरानी जब ‘सास भी कभी बहू थी’ में काम कर रही थीं तो उस दौरान उन्होंने धमकी दी थी कि यदि नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देते तो वह आमरण अनशन शुरू करेंगी और इसकी शुरूआत वाजपेयी के जन्मदिन से करेंगी।

अडवानी ने किया था हस्तक्षेप
उनके इस मोदी विरोधी बयान से भाजपा में इतना बवाल मच गया था कि लाल कृष्ण अडवानी को हस्ताक्षेप करना पड़ा था। मामले का संज्ञान लेते हुए अडवानी ने स्मृति को बुलाया और उनसे पूछा कि मोदी विरोधी बयान के पीछे उनकी क्या मंशा है? हालांकि उस समय स्मृति सक्रिय राजनीति में नहीं थीं। उन दिनों वह जिस धारावाहिक में मुख्य भूमिका में थीं वह उस दौरान घर-घर अपनी पैठ बना चुका था। लिहाजा कई जानकारों का यह भी मानना था कि स्मृति ने मोदी विरोधी बयान अपने धारावाहिक की टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए दिया था। तर्क कुछ भी हो लेकिन यह तय है कि गुजरात दंगों के बाद भाजपा का धर्मनिरपेक्ष धड़ा मोदी के खिलाफ हो गया था और स्मृति भी उनमें से एक थीं।

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