..जहां सदियों से नहीं जल रही होलिका

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Sunday, March 16, 2014-10:27 AM

रायपुर: छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में सैकड़ों वर्षों से होलिका नहीं जलाई जाती है। ऐसा ही एक गांव है धमतरी जिले का तेलीनसत्ती। यहां के बड़े बुजुर्गों ने गांव में कभी होलिका जलते नहीं देखा, अलबत्ता वे होली जरूर मनाते हैं। कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि यहां 16वीं शताब्दी से होलिका नहीं जली। गांव के 85 साल के देवलाल साहू, 82 साल के बहुर साहू व अन्य के मुताबिक 16वीं शताब्दी में तेलीनसत्ती गांव में एक मालगुजार के सात बेटे व एक बेटी थी। बहन की शादी तय हुई। भाइयों के खेत का मेड़ रोज फूट जाता था। भाइयों ने एक रात अपने होने वाले दामाद को ही मेड़ में पाट दिया। उसकी बहन खेत गई। उसने मृत युवक की ऊंगली पकड़कर सात फेरे लिए और चिता में जलाकर सती हो गई। इसके बाद से आज तक यहां होलिका नहीं जली।

कुंवारी कन्या के सती होने के बाद उसके सभी भाई गांव से भाग गए। तब से गांव वाले सती को पूजने लगे। गांव में उसकी प्रतिमा स्थापित कर छोटा-सा मंदिर बनाया गया है। गांव का नाम भी इसी के चलते तेलीनसत्ती पड़ा और यह गांव की इष्टदेवी हैं। इस घटना के बाद से यहां न होली जलती है और न ही किसी मृत व्यक्ति की चिता। गांववाले होली के दूसरे दिन रंग-गुलाल खेलकर खुशी जरूर मनाते हैं। सूबे के बालोद जिले के डौंडी विकासखंड के गांव पुसावड़ में भी होलिका जलाने का रिवाज नहीं है। सौ साल पहले होलिका दहन के दौरान हुए हादसे से सबक लेते हुए गांव के बुजुर्गों ने होलिका दहन नहीं करने का निर्णय लिया था। बताया जाता है कि यहां होली खेलने के लिए कुछ विशेष नियम बनाए गए हैं। इन नियमों का पालन सभी कर रहे हैं। सरपंच बनवाली राम, चिराम, ग्रामीण चुन्नी लाल व अन्य ने बताया कि गांव के बुजुर्गों ने जो कारण और तर्क दिए, उसके बाद से बाद अभी तक वे उन नियमों का पालन कर रहे हैं।

पुसावड़ के बुजुर्ग ताजीराम चिराम (54) ने बताया कि करीब सौ साल पहले होलिका दहन के दिन गांव के लड़के ने किसान की बैलगाड़ी में आग लगा दी। इससे किसान की रोजी-रोटी छिन गई। किसान शांत रहा लेकिन अगले साल होलिका में उसने उस लड़के को ही जलाने की कोशिश की। गांव में तनाव था। उसके बाद गांववालों ने होलिका नहीं जलाने का फैसला लिया। इसी तरह रायगढ़ जिले का हट्टापाली ग्राम पंचायत के पांच गांवों में 150 साल से ग्रामीण होली नहीं मनाते हैं। यह पंचायत रायगढ़ से 80 किमी दूर है। गांववालों का मानना है कि होली खेलने से उनके देवता नाराज हो जाते हैं। इससे गांव में सूखा सहित कई प्राकृतिक विपदाएं आ पड़ती हैं।

बरमकेला ब्लॉक के ग्राम पंचायत हट्टापाली के आश्रित ग्राम मंजूरपाली, छिंदपतेरा, जगदीशपुर, अमलीपाली और हट्टापाली में पिछले 100-150 सालों से होली नहीं खेली जा रही है, जबकि आसपास के करपी पंचायत, खम्हरिया, कालाखूंटा, करनपाली व झाल सहित अन्य पंचायतों और गांवों में होली मनाई जाती है। छिंदपतेरा के निवासी डमरूधर पटेल बताते हैं कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना है कि करीब 150 साल पहले गांव में होली के दिन एक बाघ पहुंचा और वह बैगा को उठा ले गया। उस साल गांव में सूखा भी पड़ा। तब से लोग होली नहीं मनाते हैं।

अब बात कोरिया जिले की करते हैं। गत 11 मार्च को न होली थी, न धुरेड़ी पर बैकुंठपुर जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत अमरपुर के लोगों ने नगाड़ों की थाप के बीच जमकर अबीर-गुलाल उड़ाया। लोगों ने एक-दूसरे को रंग अबीर लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं। दिनभर गांव में चारों ओर मस्ती, उल्लास, उमंग से सराबोर युवाओं की टोली एक-दूसरे मोहल्ले में जा-जाकर अपने हमजोलियों को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं दे रहे थे। ऐसा वे इसी साल नहीं कर रहे थे, बल्कि कई दशकों से अमरपुर के लोग होली के पांच दिन पहले ही होली मना लेते हैं।

इसकी वजह है कि अगर पांच दिन पहले होली नहीं मनाई तो प्राकृतिक आपदाएं आएंगी। यूं तो आने वाली 16 मार्च की रात होलिका दहन होगा और उसके बाद दूसरे दिन यानी 17 मार्च सोमवार को देशभर में धुरेड़ी, होली का पर्व मनाया जाएगा। पर कोरिया जिले के बैकुंठपुर विकासखंड के अंतर्गत आने वाले अमरपुर में यह त्योहार पांच दिन पहले ही मना लिया गया।


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