कला की अनूठी कृतियों को देखकर मोहित हुए कदरदान

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Thursday, March 20, 2014-12:46 AM

नई दिल्ली(अशोक चौधरी): शहरी क्षेत्र में पलायन, मानवी पुष्पों और वास्तुशिल्पीय रूपों से प्रफुल्लित रंगों और ब्रश के सहारे कला को जिंदगी की वास्तविकता को कैनवस पर उतार कर चित्रकारी को अलंकृत करती पेंटिंग्स की प्रदर्शनी का संगम रवींद्र भवन में सज गई है, जिसका उद्घाटन बुधवार को मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रजा ने किया। प्रदर्शनी 10 अप्रैल तक चलेगी, जिसका प्रवेश नि:शुल्क है।


ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित होने वाली 55वीं कला प्रदर्शनी विश्व समकालीनता पर आधारित है, जिसमें एक विकृत वास्तविकता, स्वायत्त स्व-विकसित ढांचों का प्रकृति की परिवर्तनीय और रूपंकारी शक्तियों के अनुरूप सृजन किया गया है।


यह प्रदर्शनी सामान्य पदार्थों की समकालिकता और विलयन में अनदेखे क्रम परिवर्तन और संयोगों से जोड़ते हुए विलक्षण अर्थ प्रदान करती है। प्रदर्शनी मूलत: भंग मानवी दशाआें के निदान हेतु आकस्मिकता की समझ को संप्रेषित करने और अकथनीय को अभिव्यक्त करने के लिए आकृतिमूलक और अमूर्त, भौतिक और अभौतिक के मध्य सेतु का निर्माण करती है।


यह स्मरण करवाती है कि गुप्त जगत उन पदार्थों से जुड़ा होता है, जो उन्हें गुप्त बनाते हैं। लकड़ी की लाल नौका के नीचे काई है, उसके नीचे कीट और मेंढक हैं। ज्वारताल हमें अथाह समुद्र से जोड़ते हैं, हमारे गुणसूत्रों से हमें जोड़ते हैं।


चित्रण को प्रस्तुत करने के लिए टेराकोटा, स्टील, प्लास्टिक, कैनवस, जूट, वेल्ड लोहे, कांस्य, ब्रास, जिंक, प्लेट, सीरेमिक, लकड़ी, फाइबर ग्लास, तैल एक्रीलिक, ईचिंग, जलरंग, चारकोल, लिथोग्राफी, उत्कीर्णन, रेत ढलाई, स्टेन्सिल कट और मिश्रित माध्यम का प्रयोग किया गया है।


प्रदर्शनी में शहर-ईंट, पत्थर, सीमैंट, स्टील और कंक्रीट का एक कच्चा ढांचा, जहां लोग इकट्ठे हुए बगैर साथ-साथ एकाकीपन में बिना किसी उत्साह या प्रफुल्लता के भौतिक और मानसिक दीवारों के पीछे रहते हैं। मनुष्यों और जानवरों को हृदय विदारक दुख और विध्वसांत्मक निराशा के भावों के साथ उन्मूलन के परे एकाकीपन में दिखाया गया है।


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