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बस्तर सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रखना आसान नही

  • बस्तर सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रखना आसान नही
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Sunday, March 30, 2014-3:56 PM

रायपुर/जगदलपुर: देश की सर्वाधिक नक्सल प्रभावित बस्तर संसदीय सीट पर लगातार पांच बार से कब्जा जमाए भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के लिए छठीं बार भी कब्जा बरकरार रखना एक बडी चुनौती है। तीन राज्यों आन्ध्रप्रदेश, ओडिशा एवं महाराष्ट्र की सीमा से जुडे इस संसदीय क्षेत्र का अधिकांश इलाका नक्सल प्रभावित है। घने जंगलों से आच्छादित इस इलाके की देश की पहचान अब खूनी ङ्क्षहसा से होती है। नक्सलियों के हमले में सुरक्षा बलो के जवानों की आए दिन होने वाली शहादत एवं बेकसूर आम लोगो की नक्सलियों द्वारा होने वाली हत्याएं स्थानीय ही नही राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बनती है। कभी खूबसूरत जगलों और आदिवासी संस्कृति के लिए जाने वाले इस क्षेत्र में जिन्दगी और मौत के बीच जीवन जीने की आदत हो गई है।

चुनौती के बाद भी इस इलाके के लोगो में गजब का जज्बा है और नक्सलियों की बहिष्कार की धमकियों के बावजूद लगातार चुनावों में हिस्सा ले रहे है और अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे है। बस्तर संसदीय सीट पर 1998 के चुनाव से ही भाजपा का लगातार कब्जा है। भाजपा के प्रत्याशी बलीराम कश्यप ने इस सीट से 1998/1999/2004/2009 में जीत दर्ज की। कश्यप के निधन के बाद पार्टी ने 2011 में हुए उप चुनाव में उनके पुत्र दिनेश कश्यप को प्रत्याशी बनाया और उन्होने भी जीत दर्ज की। कश्यप को पार्टी ने इस बार भी मैदान में उतारा है पर इस बार उनकी राह आसान नही है। इस सीट पर इस बार कांग्रेस ने प्रत्याशी बदलकर पिछले वर्ष झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में शहीद महेन्द्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा को मैदान में उतारा है जबकि आम आदमी पार्टी(आप) ने नक्सलियों की कथित समर्थक होने के आरोप में जेल में बन्द रह चुकी सोनी सोढी को यहां से टिकट दिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीआई) ने यहां से विमला सोढी को टिकट दिया है जोकि सोनी सोढी के ही परिवार की बताई जाती है।

इन चार उम्मीदवारों सहित यहां से कुल आठ उम्मीदवार चुनाव मैदान में अपनी चुनावी किस्मत आजमा रहे है।  इस बार सबसे दिलचस्प इस संसदीय सीट पर एक भी निर्दलीय प्रत्याशी का नही होना है। यह इसलिए दिलचस्प है कि इस सीट से अब तक पांच बार निर्दलीय चुनाव जीत चुके है। देश में 1952 में हुए पहले चुनाव में इस सीट से निर्दलीय नें जीत हासिल की थी। इसके बाद 1962/1967/1971 में निर्दलीय ने जीत दर्ज की1यहां से 1996 में निर्दलीय चुनाव जीतने वाले महेन्द्र कर्मा आखिरी उम्मीदवार थे। इस इलाके में आने वाली आठ विधानसभा सीटों में 2008 में हुए चुनाव में सात भाजपा के कब्जे में थी जबकि 2013 के विधानसभा चुनाव में स्थिति एकदम उलट गई है। भाजपा के गढ रहे इस इलाके की आठ में से पांच सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है जबकि भाजपा को महज तीन सीटों पर सन्तोष करना पडा। बस्तर क्षेत्र में कांग्रेस भाजपा के अलावा वामपंथी दलों का आधार रहा है।

पिछले कुछ वर्षो में जहां वामपंथी दलों का आधार घटा है वहीं भाजपा का आधार बढा है। हाल ही मे हुए विधानसभा चुनावों में जरूर भाजपा को झटका लगा है। भाजपा संसदीय चुनाव में अपना खोया हुआ आधार हासिल करने की जी तोड कोशिश कर रही है। भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी कोन्डागांव में चुनावी सभा को सम्बोधित कर चुके है। इसके अलावा मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के भी इलाके में कुछ चुनावी सभाओं को सम्बोधित करने का कार्यक्रम है। पार्टी संगठन ने राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय को चुनाव का प्रभारी बना रखा है। पांडेय बस्तर में ही कैम्प कर रहे है। भाजपा प्रत्याशी के पास परिवार की विरासत है लेकिन इलाके में उनकी सक्रियता को लेकर सवाल उठते रहे है। उनके भाई केदार कश्यप पिछले 10 वर्षो से मंत्री है औरआदिवासी कल्याण विभाग भी उनके पास है लेकिन आदिवासी बाहुल इस इलाके में विकास कार्यो के लिए केन्द्र से मिलने वाली राशि खर्च नही हो पा रही है।

कश्यप परिवार का पांच बार से सीट पर लगातार कब्जा है इस कारण लोग बदलाव की बात भी करते सुने जा रहे है। कांग्रेस ने महेन्द्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा को उम्मीदवार बनाया है। अगर विधानसभा चुनावों को आधार माने तो उनकी स्थिति भाजपा प्रत्याशी के मुकाबले काफी बेहतर है। संसदीय क्षेत्र काफी बडे भूभाग में फैला है इस कारण उनकी व्यक्तिगत पहचान सभी क्षेत्रों में एक जैसी नही है। हालांकि उनके पास पिता की विरासत है जिनकी पहचान नक्सलियों से लगातार मोर्चा लेने के कारण बस्तर के शेर के रूप में थी।


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