निष्ठा बदली तो वह भारत की होकर रह गई

  • निष्ठा बदली तो वह भारत की होकर रह गई
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Sunday, December 21, 2014-12:54 PM

भगिनी निवेदिता एक आयरिश युवती थीं। उनके नाना हैमिल्टन की देखरेख में उनमें प्रखर राष्ट्रभाव प्रदीप्त हुआ था। स्वामी विवेकानंद जी के प्रति अनन्य श्रद्धाभाव लेकर वह भारत आई थी। भारत आकर उन्होंने तन-मन धन से प्लेग की महामारी में प्रशंसनीय कार्य किया, फिर भी अंग्रेज होने के कारण भारत आने के बाद भी उनमें कुछ दृष्टिभेद रह ही गया था।

उन दिनों स्वामी विवेकानंद जी अपने विदेशी शिष्यों के साथ नैनीताल में अध्ययन-मनन, चिंतन एवं वार्तालाप के माध्यम से सहयोगी कार्यकर्ता निर्माण चल रहा था। स्वामी विवेकानंद परख करना चाहते थे कि भगिनी निवेदिता  में व्यक्तिनिष्ठा है या तत्व निष्ठा। अत: एक दिन स्वामी जी ने अनायास ही उनसे पूछ लिया- ‘‘निवेदिता! तुम्हारी राष्ट्रीयता क्या है?’’

दृढ़निश्चयी निवेदिता का स्पष्ट उत्तर था, ‘‘निश्चित रूप से ब्रिटिश और स्वामी जी। इंगलैंड के यूनियन जैक (राष्ट्रध्वज) के प्रति मेरे मन में वही श्रद्धा है जितनी एक भारतीय नारी के हृदय में अपने ईष्टदेव (ठाकुर) के प्रति होती है।’’

स्वामी जी को ऐसे उत्तर की कल्पना नहीं थी। अत: उत्तर सुनकर वह स्तम्भित रह गए। उन्हें आभास हो गया कि उनकी मानस पुत्री की शिक्षा अभी अधूरी है। स्वयं को अंग्रेजी राष्ट्रीयता का अभिन्न अंग मानकर चलने वाला प्राणी उनकी मातृभूमि की सेवा कैसे कर सकेगा? अत: कार्यक्षेत्र में उतरने से पहले और प्रशिक्षण आवश्यक है। सेवा के लिए पहले भक्ति आवश्यक है। यह मन ही मन सोचकर उन्होंने प्रशिक्षण की दिशा तय की।

प्रयोगात्मक प्रशिक्षण देने के लिए अन्य शिष्य समूह के साथ हिममंडित पर्वतमालाओं की ओर निकल पड़े। भक्ति व संयम, ध्येयनिष्ठा व दृष्टि शुद्धि जगाने में उदाहरण एवं अनुकरण विधि अधिक कारगर होती है। इसलिए स्वामी जी की देश दर्शन यात्रा भी शिष्य मंडली के प्रशिक्षण का एक अंग बन गई। आगे चलकर भगिनी निवेदिता की निष्ठा बदली और वे भारत की होकर रह गई।


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