‘लोक अदालतें निपटा रहीं’ वर्षों से लटकते आ रहे मुकद्दमे!

Edited By Updated: 25 Jul, 2026 02:37 AM

lok adalats are settling cases pending for years

देश की अदालतों में लम्बित मामलों को निपटाने के लिए 1982 में पहली बार लोक अदालत लगाई गई थी। 1987 में न्याय के इस माडल को आगे बढ़ाने के लिए संसद में ‘नैशनल लीगल सॢवसेज अथॉरिटी एक्ट’ पास किया गया।

देश की अदालतों में लम्बित मामलों को निपटाने के लिए 1982 में पहली बार लोक अदालत लगाई गई थी। 1987 में न्याय के इस माडल को आगे बढ़ाने के लिए संसद में ‘नैशनल लीगल सॢवसेज अथॉरिटी एक्ट’ पास किया गया। 1995 में इस कानून में सुधार करके पूरे देश में जिला स्तर पर इस तरह की लोक अदालतें लगाने का लाभ सुनिश्चित किया गया और 2002 में इसी कानून में सुधार करके इन लोक अदालतों को स्थायी रूप से आयोजित करनेे की व्यवस्था कर दी गई।

‘नैशनल लीगल सॢवसेज अथॉरिटी’ की आधिकारिक वैबसाइट के आंकड़ों के अनुसार 30 सितम्बर, 2025 तक देश में लोक अदालतों में 8.25 करोड़ ऐसे मामलों का निपटारा हो चुका है जो हत्या, बलात्कार, आतंकवाद या भ्रष्टïाचार जैसे गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आते।     
इस वर्ष 14 मार्च, 9 मई तथा 18 जुलाई को देश में आयोजित लोक अदालतों में दोनों पक्षों की आपसी सहमति तथा सौहार्दपूर्वक निपटाए गए विभिन्न विवादों के चंद उदाहरण निम्न में दर्ज हैं :

* 9 मई को ‘पानीपत’ में आयोजित लोक अदालत में ट्रैफिक चालान, सड़क दुर्घटना, चैक बाऊंस आदि के मामले निपटाने के अलावा 2 भाइयों के बीच चार वर्षों से चला आ रहा विवाद निपटाया गया। लोक अदालत ने दोनों भाइयों का मनमुटाव दूर किया और जज के सामने ही हंसते हुए गले मिल कर उन्होंने आपस में समझौता कर लिया। 
* 9 मई को ही एक ट्रक दुर्घटना में दिव्यांग हुए व्यक्ति को दिव्यांगता प्रमाणपत्र न होने के कारण बीमा कम्पनी द्वारा क्लेम देने से इंकार करने पर  पानीपत में आयोजित लोक अदालत ने अस्पताल से दिव्यांगता प्रमाणपत्र दिलवाकर उसका 9.5 लाख रुपयों का क्लेम पास करवाया। इसी प्रकार एक अन्य मामले में अदालत ने सड़क दुर्घटना में मारे गए 2 युवकों के परिजनों को एक बीमा कम्पनी से 17.80-17.80 लाख रुपयों का क्लेम पास करवाया।

* 9 मई को ही ‘अम्बाला’ और ‘पंचकूला’ के 2013-14 से अलग रह रहे कई दम्पतियों ने पुरानी रंजिशें भुला कर आपसी सहमति से मुकद्दमे वापस लिए और एक-दूसरे को माला पहना कर साथ रहने का फैसला किया।
* 9 मई को ही ‘रोहतक’ में आयोजित लोक अदालत में भूमि अधिग्रहण के 10 मामलों में से 9 का समाधान करके लगभग 1 करोड़ 72 लाख रुपए से अधिक राशि के समझौते हुए।
* 18 जुलाई को ‘चंडीगढ़’ में एक विशेष लोक अदालत में 1046 विवादों का मौके पर ही सौहार्दपूर्ण निपटारा करके लगभग 5.99 करोड़ रुपए की सैटलमैंट राशि तय करने के अलावा अदालत की काऊंसलिंग बैंच ने 28 वर्ष पुराने एक वैवाहिक विवाद और तलाक के मामले को दोनों पक्षों की आपसी सहमति से निपटा कर एक परिवार को टूटने से बचाया। 

* 18 जुलाई को ही बिहार के विभिन्न जिलों में विशेष अदालतों में चैक बाऊंस आदि के 397 लंबित मुकद्दमों का आपसी सहमति से निपटारा करवाया गया।
* 18 जुलाई को ही राजस्थान में आयोजित विभिन्न लोक अदालतों में काफी समय से लटकते आ रहे विभिन्न वित्तीय मामलों के निपटारे के दौरान 15 करोड़ 35 लाख 2200 रुपयों के अवार्ड पास किए गए।
* 18 जुलाई को ही मध्य प्रदेश के ‘ग्वालियर’ में प्री लिटीगेशन के विभिन्न मामलों में 75 लाख रुपयों से अधिक के अवार्ड पास किए गए। 
ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं। वर्षों से लटकते आ रहे मुकद्दमों को मात्र एक दिन में निपटा कर लोक अदालतें जहां वर्षों से लटकते आ रहे मुकद्दमों का बोझ घटाने में बड़ा योगदान देती हैं, वहीं इनसे विभिन्न मामलों में उलझे लोगों को भी राहत मिलती है। छोटे-मोटे झगड़े लोक अदालतों में सुलझा लेने से जेलों में विचाराधीन कैदियों की भीड़ कम करने में भी सहायता मिल सकती है।

लोक अदालतों के फैसलों को सिविल कोर्ट की ‘डिक्री’ का दर्जा प्राप्त होता है और उनके विरुद्ध किसी भी ऊपरी अदालत में अपील  दायर नहीं की जा सकती। लोक अदालतों में जहां विभिन्न पक्षकारों को लम्बे समय से चल रही अदालती कार्रवाई और अदालती खर्चों से राहत मिलती है, वहीं इनमें केस दायर करने वालों द्वारा जमा करवाई स्टैम्प ड़्यूटी भी उन्हें वापस मिल जाती है। अत: लोगों को इनका अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। सरकार को भी ऐसी अदालतों में और वृद्धि करनी चाहिए। इससे जहां पीड़ितों को लम्बे समय तक चलने वाले मुकद्दमों के तनाव से छुटकारा मिलेगा वहीं अदालतों को मुकद्दमों के बोझ से और जेलों को कैदियों के बोझ से भी मुक्ति मिलेगी।-विजय कुमार 

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