आक्रोश की आड़ में अराजकता का एजैंडा!

Edited By Updated: 22 Jul, 2026 03:51 AM

agenda of anarchy under the guise of anger

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहनशीलता है। यहां असहमति को सम्मान मिलता है, विरोध को स्थान मिलता है और सरकारों से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार माना जाता है। लेकिन लोकतंत्र की यही शक्ति तब उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है, जब विरोध और अराजकता के बीच...

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहनशीलता है। यहां असहमति को सम्मान मिलता है, विरोध को स्थान मिलता है और सरकारों से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार माना जाता है। लेकिन लोकतंत्र की यही शक्ति तब उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है, जब विरोध और अराजकता के बीच की लक्ष्मण रेखा जानबूझकर धुंधली कर दी जाए। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर यही प्रश्न खड़ा किया है कि क्या देश में हर जनभावना को राजनीतिक संघर्ष का औजार बनाने की परंपरा मजबूत होती जा रही है? इसमें कोई विवाद नहीं कि प्रतियोगी परीक्षाओं की अव्यवस्था ने लाखों युवाओं का धैर्य तोड़ा है।

वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले अभ्यर्थी, कर्ज लेकर बच्चों को कोचिंग दिलाने वाले माता-पिता, बार-बार स्थगित होती परीक्षाएं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं का वर्षों तक अदालतों में उलझना और समय पर नियुक्तियां नहीं मिलना, ये सब ऐसे घाव हैं, जिनकी पीड़ा को कोई भी संवेदनशील समाज नकार नहीं सकता। देश का युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि अपने भविष्य की निश्चितता मांग रहा है। उसकी यह मांग पूरी तरह न्यायसंगत है और सरकार का दायित्व भी है कि वह परीक्षा प्रणाली में जनता का भरोसा हर कीमत पर बहाल करे। लेकिन सवाल यह है कि क्या युवाओं की इसी वास्तविक पीड़ा को कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूह अपने-अपने एजैंडे के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहे? जंतर-मंतर का घटनाक्रम केवल विद्याॢथयों के आक्रोश तक सीमित दिखाई नहीं दिया। वहां जिस प्रकार की राजनीतिक सक्रियता, उत्तेजक भाषण और टकराव का वातावरण देखने को मिला, उसने स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न खड़े कर दिए। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है लेकिन कानून लागू कराने वाली पुलिस को खुलेआम चुनौती देना, उसके विरुद्ध भीड़ को उकसाने वाली भाषा का प्रयोग करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता। 

आज दुर्भाग्य यह है कि देश में कोई भी बड़ा मुद्दा सामने आते ही कुछ स्थायी चेहरे हर आंदोलन में दिखाई देने लगते हैं। विषय बदल जाते हैं, नारे बदल जाते हैं लेकिन मंच पर मौजूद चेहरे शायद ही बदलते हों। कृषि कानूनों का आंदोलन हो, नागरिकता संशोधन कानून का विरोध, अग्निवीर योजना का विवाद या अब प्रतियोगी परीक्षाओं का प्रश्न, हर बार वही राजनीतिक और वैचारिक समूह सबसे आगे दिखाई देते हैं। यह भी कम चिंता की बात नहीं कि सोशल मीडिया अब किसी भी आंदोलन का सबसे प्रभावशाली हथियार बन चुका है। कुछ सैकेंड के वीडियो, चुनिंदा दृश्य, भावनात्मक संगीत और आक्रामक टिप्पणियां कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती हैं। पूरे घटना का संदर्भ पीछे छूट जाता है और एक भावनात्मक नैरेटिव आगे आ जाता है। इसलिए केवल सरकार ही नहीं, मीडिया, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ जाती है। यदि राजधानी में इतने बड़े स्तर पर भीड़ जुटी और प्रशासन उसकी गंभीरता का समय रहते आकलन नहीं कर पाया, तो यह खुफिया तंत्र की कमजोरी मानी जाएगी। यदि समय रहते संवाद स्थापित किया जाता और आवश्यक तैयारी होती, तो शायद हालात इतने तनावपूर्ण नहीं बनते। लेकिन सरकार की इस कमी का अर्थ यह भी नहीं कि कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वालों को खुली छूट दे दी जाए। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहली जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है। 

यदि भीड़ नियंत्रण से बाहर जाने लगे, यदि पुलिस पर दबाव बनाने या उसे उकसाने का प्रयास किया जाए, तो कार्रवाई करना प्रशासन का दायित्व बन जाता है। संविधान नागरिकों को प्रदर्शन का अधिकार देता है लेकिन किसी को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, कानून अपने हाथ में लेने या समाज में अराजकता फैलाने का नहीं। सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि इस पूरे घटनाक्रम में वास्तविक मुद्दा कहीं पीछे छूटता दिखाई दिया। चर्चा इस बात की कम हुई कि परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी कैसे बनाया जाए, पेपर लीक कैसे रोके जाएं, भर्ती प्रक्रियाएं समयबद्ध कैसे हों और युवाओं का भविष्य कैसे सुरक्षित किया जाए। इसकी बजाय बहस सरकार और विपक्ष के टकराव तक सिमट गई। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों विद्यार्थियों को होगा, जिनके नाम पर यह पूरा आंदोलन खड़ा हुआ। समय की मांग है कि सरकार परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करे, पेपर लीक करने वालों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई करे, भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध बनाए और न्यायिक विवादों के त्वरित समाधान का रास्ता निकाले।

युवाओं की पीड़ा पर राजनीति करने से किसी का भविष्य नहीं बनता। रोजगार का रास्ता नारे नहीं, नीतियां बनाती हैं। यदि विरोध व्यवस्था को तोडऩे लगे, यदि आक्रोश राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का हथियार बन जाए और यदि युवाओं के सपनों का इस्तेमाल सत्ता संघर्ष के मंच के रूप में होने लगे तो सबसे पहले लोकतंत्र ही घायल होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश का युवा राजनीतिक मोहरा नहीं, राष्ट्रीय प्राथमिकता बने। सरकार से जवाबदेही भी मांगी जाए और कानून का सम्मान भी किया जाए। यही लोकतंत्र की मर्यादा है, यही संविधान की भावना है और यही भारत के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।-बालकृष्ण थरेजा

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