जिम्मेदारी तय करने का फैसला : इलाहाबाद हाईकोर्ट तारीफ के काबिल

Edited By Updated: 10 Sep, 2026 05:11 AM

allahabad high court s decision to fix responsibility is commendable

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह फैसला, जिसमें मजदूरों के लिए न्याय की मांग करने वाले प्रदर्शन में भाग लेने के कारण एक 25 वर्षीय कानून की एक्टिविस्ट को कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एन.एस.ए.) के तहत गिरफ्तार किया गया था, उन नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों...

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह फैसला, जिसमें मजदूरों के लिए न्याय की मांग करने वाले प्रदर्शन में भाग लेने के कारण एक 25 वर्षीय कानून की एक्टिविस्ट को कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एन.एस.ए.) के तहत गिरफ्तार किया गया था, उन नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए, जो संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सरकार के प्रति निष्ठावान दिखते हैं। यह फैसला एक ऐसी चीज के लिए भी सराहा जाना चाहिए, जो सभी अदालतों को करनी चाहिए-दोषी अधिकारियों, जिनमें पुलिस कर्मी भी शामिल हैं, की जिम्मेदारी तय करना। ऐसा उन अधिकारियों के लिए है, जो बिना सोचे-समझे या केवल राजनीतिक नेताओं को खुश करने के लिए मामले दर्ज करते हैं और खराब जांच करते हैं।

फैसले में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिला मजिस्ट्रेट, मेधा रूपम द्वारा कानून की छात्रा आकृति चौधरी को एन.एस.ए. के तहत गिरफ्तार करने के निर्णय को ‘उपहास के योग्य’ बताया और आदेश दिया गया कि उनके और इसमें शामिल अन्य लोगों के प्रति अपनी नाराजगी को ‘उनके सेवा रिकॉर्ड में दर्ज’ किया जाए। इतना ही नहीं, अदालत ने एक्टिविस्ट को 5 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसकी वसूली उस जिला मजिस्ट्रेट के वेतन से की जाएगी, जिसने ‘बिना सोचे-समझे’ हिरासती आदेश पारित किया था।

साथ ही, उन सभी अन्य अधिकारियों से भी वसूली करने को कहा गया जो इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं, जिसमें पुलिस स्टेशन के एस.एच.ओ. तक शामिल हैं, जिन्होंने याचिकाकत्र्ता को एन.एस.ए. के प्रावधानों के तहत हिरासत में लेने का वारंट तैयार किया था। अदालत ने गौर किया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि एक्टिविस्ट ने ङ्क्षहसा भड़काई या उकसाया था। अदालत ने रिकॉर्ड में हेरफेर और प्रदर्शन में शामिल लोगों को संदेश भेजने की एक सोची-समझी कोशिश पाई। राज्य द्वारा जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से ‘अधिकारों के लापरवाही भरे और मनमाने इस्तेमाल’ की ओर इशारा करते हुए, अदालत ने नौकरशाही के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां कीं और कहा कि ऐसा ‘गलत’ व्यवहार उत्तर प्रदेश को एक ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ (तानाशाहीपूर्ण राज्य) में बदल सकता है।

वास्तव में, जब से योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है, अखिलेश यादव सरकार के तहत तथाकथित ‘जंगलराज’ राज्य ‘पुलिस राज’ में बदल गया है। वर्तमान सरकार विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय से संबंधित प्रदर्शनकारियों के घरों को कमजोर आधारों पर ढहाने के ‘बुलडोजर न्याय’, बड़े पैमाने पर फर्जी मुठभेड़ों और संदिग्धों की सार्वजनिक पिटाई के लिए जानी जाती है। जाहिर है, ऐसी कार्रवाइयां राज्य सरकार की स्पष्ट मिलीभगत के बिना पुलिस और सरकारी अधिकारियों द्वारा नहीं की जा सकतीं। स्वाभाविक रूप से, शक्तियों के अवैध दुरुपयोग के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती। लोकतांत्रिक सिद्धांतों का मजाक उड़ाने वाली राज्य सरकार की पृष्ठभूमि के खिलाफ, यह फैसला उस सरकार के लिए एक चेतावनी होना चाहिए, जो देश के कानून के साथ अपमानजनक व्यवहार कर रही है।
हालांकि कुछ फैसलों ने पहले भी राज्य की ऐसी क्रूरता के खिलाफ चेतावनी दी थी लेकिन यह पहला ऐसा फैसला है जो सरकारी अधिकारियों पर जिम्मेदारी डालता है और कानून की उचित प्रक्रिया की अनदेखी करने के लिए उन्हें दंडित करता है।

देश में अनगिनत ऐसे मामले हैं, जिनमें निर्दोषों पर झूठे मामले थोप दिए गए, जिससे हमारी धीमी न्याय प्रणाली के कारण उन्हें विचाराधीन कैदी के रूप में लंबी हिरासत झेलनी पड़ी। एक मामला जो तुरंत याद आता है, वह इसरो के एक वैज्ञानिक का है, जिस पर जासूसी का आरोप लगाया गया था लेकिन 15 साल से अधिक समय बाद वह निर्दोष पाया गया। हालांकि इनमें से कुछ मामलों में अदालतों ने जांचकत्र्ताओं को दोषी ठहराया था लेकिन नोएडा मामले में वास्तव में कानूनों का दुरुपयोग करने वालों पर जुर्माना लगाया गया है। इसी तरह, उन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, जिन्हें जिम्मेदारी सौंपी जाती है लेकिन वे इसे निभाने में विफल रहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली में हाल ही में ढही इमारत को लें, जिसमें छात्रों के लिए पेइंग गैस्ट आवास था। इमारत के मालिक को तो सही ढंग से गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन अवैध निर्माण गतिविधि के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को केवल निलंबित किया गया है। उन्हें उनके सौंपे गए कत्र्तव्यों का पालन न करने के लिए समान रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना और उनके खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज किया जाना चाहिए। देश भर की अदालतों को जस्टिस अतुल श्रीधरन और अचल सचदेव द्वारा सुनाए गए फैसले से मार्गदर्शन लेना चाहिए और दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।-विपिन पब्बी
 

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