Edited By ,Updated: 10 Sep, 2026 05:20 AM

भारत को ऐसी नौकरशाही की आवश्यकता है जो परिणामों के प्रति जवाबदेह हो, प्रदर्शन को पुरस्कृत करे और परिणाम देने वालों को सशक्त बनाए। नौकरशाही को पारंपरिक रूप से शासन की रीढ़ माना गया है। भारत में, सिविल सेवाएं देश के कुछ सबसे प्रतिभाशाली और सक्षम...
भारत को ऐसी नौकरशाही की आवश्यकता है जो परिणामों के प्रति जवाबदेह हो, प्रदर्शन को पुरस्कृत करे और परिणाम देने वालों को सशक्त बनाए। नौकरशाही को पारंपरिक रूप से शासन की रीढ़ माना गया है। भारत में, सिविल सेवाएं देश के कुछ सबसे प्रतिभाशाली और सक्षम युवाओं को आकॢषत करती हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और कठोर चयन प्रक्रिया के माध्यम से, राष्ट्र बुद्धिमत्ता, योग्यता और नेतृत्व क्षमता वाले व्यक्तियों की पहचान करता है और उन्हें भारी जिम्मेदारी सौंपता है। लेकिन आज एक कठिन प्रश्न पूछने की आवश्यकता है-क्या हम शासन करने के लिए चुने गए लोगों से सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त कर रहे हैं? चिंता अधिकांश सिविल सेवकों की प्रतिबद्धता या निष्ठा को लेकर नहीं है। कई अधिकारी कठिन परिस्थितियों में असाधारण समर्पण के साथ कार्य करते हैं। चिंता उस प्रणाली को लेकर है, जिसमें योग्यता, प्रदर्शन और परिणाम हमेशा जिम्मेदारी, मान्यता और पदोन्नति को निर्धारित नहीं करते। वास्तविक प्रशासनिक चुनौती यहीं निहित है।
चयन के बाद क्या होता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सशस्त्र बलों जैसे संगठनों में, पदोन्नति प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित योग्यता, नेतृत्व, व्यावसायिक ज्ञान और प्रदर्शन से जुड़ी होती है। किसी अधिकारी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपने से पहले उसका निरंतर मूल्यांकन किया जाता है। शासन को भी इससे कम की आवश्यकता नहीं है। फिर भी प्रशासनिक व्यवस्था में, प्रदर्शन और पदोन्नति के बीच का संबंध कभी-कभी धुंधला हो जाता है। वास्तविक परिणामों के साथ-साथ वरिष्ठता, पोसिं्टग, संगठनात्मक समीकरण और प्रशासनिक विचार काफी महत्व रख सकते हैं। कोई व्यक्ति असाधारण बनकर व्यवस्था में प्रवेश कर सकता है लेकिन यह व्यवस्था आवश्यक रूप से यह सुनिश्चित नहीं करती कि वह सार्वजनिक जिम्मेदारी में भी असाधारण बना रहे। यहीं पर पीटर सिद्धांत, पदानुक्रमित संगठनों में लोगों का उस स्तर तक पदोन्नत होने की प्रवृत्ति, जहां वे अब प्रभावी नहीं रह जाते, प्रासंगिक हो जाता है। मुद्दा यह नहीं है कि यह सिद्धांत प्रत्येक अधिकारी पर लागू होता है या नहीं। मुद्दा यह है कि क्या हमारी प्रणाली में यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं कि ऐसा न हो।
गलत नेतृत्व की कीमत : प्रशासनिक पद जितना ऊंचा होगा, अप्रभावी नेतृत्व के परिणाम उतने ही गंभीर होंगे। निचले स्तर पर लिया गया एक कमजोर निर्णय किसी विभाग को प्रभावित कर सकता है। वरिष्ठ स्तर पर लिया गया एक कमजोर निर्णय पूरे राज्य, क्षेत्र या राष्ट्रीय कार्यक्रम को प्रभावित कर सकता है। जब नेतृत्व के पदों पर उस विशेष जिम्मेदारी के लिए प्रदॢशत क्षमता पर पर्याप्त जोर दिए बिना नियुक्ति की जाती है, तो इसके परिणाम हो सकते हैं-निर्णयों में देरी, अत्यधिक प्रक्रियात्मकता, जवाबदेही का अभाव, खराब क्रियान्वयन, नवाचार के प्रति अनिच्छा, संस्थागत पहल का ह्रास और नीतियां जो कागजों पर उत्कृष्ट दिखती हैं लेकिन जमीन पर विफल हो जाती हैं। अंतत:, इसका खामियाजा नागरिक को भुगतना पड़ता है। ‘अच्छे अधिकारी’ की समस्या एक और मुद्दा है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उस अधिकारी का क्या होता है जो पारंपरिक सोच को चुनौती देता है, कठिन निर्णय लेता है, सुधार लागू करता है या असाधारण परिणाम देता है? क्या यह व्यवस्था ऐसे प्रदर्शन को निरंतर मान्यता देती है? या क्या ऐसे अधिकारी कभी-कभी असुविधाजनक बन जाते हैं क्योंकि वे स्थापित प्रक्रियाओं और निहित स्वार्थों को बाधित करते हैं?
यदि सक्षम अधिकारियों को बार-बार उन पदों से हटा दिया जाता है जहां वे परिणाम दे रहे हैं, जबकि औसत दर्जे के प्रदर्शन का कोई परिणाम नहीं भुगतना पड़ता, तो पूरे संगठन को जाने वाला संदेश नुकसानदेह हो सकता है। एक व्यवस्था अपने लोगों को वही सिखाती है, जिसे वह पुरस्कृत करती है। यदि यह केवल अस्तित्व बनाए रखने, अनुकूलता और प्रक्रियात्मक अनुपालन को पुरस्कृत करती है, तो लोग जोखिम को कम करना सीखेंगे। यदि यह नवाचार, जिम्मेदारी और परिणामों को पुरस्कृत करती है, तो लोग नेतृत्व करना सीखेंगे।
प्रक्रिया को शासन की सेवा करनी चाहिए, उसका स्थान नहीं लेना चाहिए। भारत ने प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे, उद्यमिता और आर्थिक आकांक्षा में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन हमारी प्रशासनिक संस्कृति के कुछ हिस्से अभी भी उस प्रणाली की विरासत को ढो रहे हैं जिसे मुख्य रूप से सुविधा प्रदान करने की बजाय नियंत्रण करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। नियम और प्रक्रियाएं आवश्यक हैं। वे संस्थाओं को मनमानेपन और भ्रष्टाचार से बचाते हैं। लेकिन प्रक्रिया सुशासन प्राप्त करने का एक साधन होनी चाहिए, निर्णय लेने से बचने का बहाना नहीं। भारत को प्रदर्शन-उन्मुख सिविल सेवा की आवश्यकता है। इसका समाधान नौकरशाही को कमजोर करना नहीं, बल्कि जवाबदेही और योग्यता के माध्यम से इसे मजबूत करना है।
भारत को ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है, जिसमें प्रत्येक वरिष्ठ लोक सेवक का मूल्यांकन केवल इस बात पर न किया जाए कि फाइलें निपटाई गईं या नहीं, बल्कि इस बात पर किया जाए कि उनके नेतृत्व के कारण क्या बदलाव आया। एक क्षेत्र में उत्कृष्ट अधिकारी आवश्यक रूप से दूसरे क्षेत्र का नेतृत्व करने के लिए सबसे अच्छा व्यक्ति नहीं हो सकता। इसलिए, महत्वपूर्ण पदों पर पोसिं्टग में केवल वरिष्ठता और उपलब्धता की बजाय डोमेन क्षमता और प्रदर्शित उपलब्धि पर तेजी से विचार किया जाना चाहिए। सफल अधिकारियों को पुरस्कृत करें। कम प्रदर्शन करने वालों में सुधार करें। हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) साइबर सुरक्षा, जलवायु जोखिम, शहरीकरण, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, वैश्विक आपूॢत शृंखलाओं, उभरती प्रौद्योगिकियों, आॢथक प्रतिस्पर्धा और तेजी से बदलती नागरिक अपेक्षाओं से निपट रहे हैं। इन चुनौतियों को केवल प्रशासनिक दिनचर्या के माध्यम से प्रबंधित नहीं किया जा सकता। इनके लिए आवश्यकता है-विशेषज्ञता की, गति की, नवाचार की, जवाबदेही की, नेतृत्व की। इसलिए नई नौकरशाही को कल की (पुरानी) नौकरशाही से बहुत अलग होना चाहिए।
देश भर में इसके पास ऐसे उत्कृष्ट अधिकारी हैं जिन्होंने साहस, नवाचार और प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया है और जिन संस्थाओं का वे नेतृत्व करते हैं, उन्हें रूपांतरित किया है। चुनौती एक ऐसी प्रणाली का निर्माण करने की है जो लगातार उनकी पहचान करे, उन्हें सशक्त बनाए और उन्हें उनकी क्षमता के अनुरूप जिम्मेदारी दे। देश ऐसी स्थिति बर्दाश्त नहीं कर सकता जहां असाधारण प्रतिभा एक ऐसी व्यवस्था से निराश हो जाए, जो असाधारण और औसत प्रदर्शन को एक समान मानती है।-कुंवर विक्रम सिंह