‘जेन-जी’ ने बदल दिया चुनावी सिलेबस

Edited By Updated: 11 Sep, 2026 04:28 AM

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अंतिम परिणति तो नतीजे ही बताएंगे लेकिन ‘जेन-जी’ के जंतर-मंतर प्रयोग ने चुनावी सिलेबस बदल दिया है। इसका दबाव राजनीतिक दलों-नेताओं पर दिख रहा है। नौकरी देने के अधूरे वायदों के अलावा याद नहीं पड़ता कि देश में कभी शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत...

अंतिम परिणति तो नतीजे ही बताएंगे लेकिन ‘जेन-जी’ के जंतर-मंतर प्रयोग ने चुनावी सिलेबस बदल दिया है। इसका दबाव राजनीतिक दलों-नेताओं पर दिख रहा है। नौकरी देने के अधूरे वायदों के अलावा याद नहीं पड़ता कि देश में कभी शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों को शासकीय तो दूर, चुनावी एजैंडा में भी प्राथमिकता मिली हो। युवाओं की बढ़ती आबादी के मद्देनजर ‘युवा भारत’ के नारे सुने जाते रहे हैं लेकिन उन्हें बेहतर शिक्षा और उपयुक्त रोजगार देकर देश के विकास की मुख्यधारा का इंजन बनाने की योजना सामने नहीं आई। हां, देश और प्रदेशों में अंतहीन पेपर लीक और भर्ती घोटालों की तलवार अक्सर युवाओं के भविष्य पर लटकी नजर आई। 

कटु सत्य यह भी कि देश का भविष्य कहे जाने वाले युवाओं के भविष्य से इस खिलवाड़ पर छात्रों-युवाओं के नाम पर बने राजनीतिक दलों के संगठन भी मूकदर्शक बने रहे। कॉकरोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) को जंतर-मंतर पर और उसके बाद उसे मिल रहा समर्थन छात्रों और युवाओं के मुद्दों की अनवरत अनदेखी का परिणाम भी है।

बेशक जंतर-मंतर पर और उसके बाद भी सी.जे.पी. से कुछ राजनीतिक दलों-नेताओं का मेलजोल नजर आ रहा है लेकिन इस सच से मुंह नहीं चुराया जा सकता कि देश के सभी दलों के शासन वाले राज्यों में पेपर लीक और भर्ती घोटाले होते रहे हैं। इसीलिए अब छात्र और युवा, जाति-धर्म-क्षेत्र-राजनीतिक रुझान की सीमाएं लांघ कर शिक्षा, परीक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर कमोबेश सभी राज्यों में सड़क पर उतर रहे हैं। जंतर-मंतर के बाद झारखंड में भी छात्रों-युवाओं का सफल आंदोलन और उसका राजनीतिकरण दिखा, तो अब स्कूली शिक्षा की बदहाली के विरुद्ध राज्य-दर-राज्य ‘जेन अल्फा’ के भी सड़क पर उतरने की खबरें हैं। जिन छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज की कक्षाओं में होना चाहिए, उनका सड़क पर उतरना देश-समाज की सकारात्मक तस्वीर पेश नहीं करता, पर उन्हें व्यवस्था ने ही मजबूर किया है। 

बिना भवन और पर्याप्त शिक्षकों के स्कूल चलने की शिकायतें देश भर में आम हैं, पर उनका निराकरण करने की बजाय बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। व्यवस्था की दृष्टि से यह प्रतिबंध उचित लग सकता है, पर स्कूल की खामियां देखने-दिखाने की अनुमति भला कौन-सा प्रशासन देगा? कुछ राज्यों से स्कूली बच्चों के पैदल जिला मुख्यालय पहुंच कर स्कूल की बदइंतजामी प्रशासन को बताने की खबरें भी यही बताती हैं कि निगरानी जिनकी जिम्मेदारी है, वे अपना काम नहीं कर रहे।

आंकड़े जो भी कहें, सच यह है कि छात्र-शिक्षक और नागरिक-चिकित्सक अनुपात ‘विकसित भारत’ के सपने से मेल हरगिज नहीं खाता। स्कूल शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद हैं। बुनियाद ही बदहाल है तो उस पर बनने वाली इमारत के हाल की कल्पना ही की जा सकती है। कुछ छात्र मेहनत और किस्मत से प्रतियोगी परीक्षाओं की दहलीज तक पहुंच जाते हैं, तो पेपर लीक और भर्ती घोटाले सपने चकनाचूर करने का चक्रव्यूह रचे तैयार मिलते हैं। पेपर लीक के लिए अक्सर कोचिंग माफिया पर उंगली उठती है। बेशक कोचिंग का दिन दोगुना-रात चौगुना फैलता कारोबार पाक-साफ नहीं है, पर उसके लिए निगरानी तंत्र बनाने की जिम्मेदारी किसकी है? राजनीतिकरण और भ्रष्टाचार से ग्रस्त शिक्षा-परीक्षा तंत्र से निष्पक्षता और पारदर्शिता की अपेक्षा ही बेमानी है। 

राज्य-दर-राज्य अदालत में चुनौती दी गईं या रद्द कर दी गईं भर्तियों की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, पर वह नौबत तो तभी आती है, जब प्रक्रिया दोषपूर्ण रहे। आखिर 2 दशक पहले भी प्रतियोगी परीक्षाएं और भर्ती होती थी। बेशक तब भी नकल और पेपर लीक के मामले आते थे। भॢतयों में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते थे, पर अपवादस्वरूप लेकिन अब तो यह परंपरा-सी बन गई है। अभ्यर्थियों के भविष्य से खिलवाड़ हमारी व्यवस्था का ‘प्रिय शगल’ बन गया लगता है। पेपर लीक हो गया तो दोबारा करा देंगे। दोबारा भी लीक हो गया तो तीसरी बार करा देंगे।

बेरहम तर्क यह कि छात्र योग्य हैं तो उन्हें दूसरी-तीसरी बार परीक्षा देने में क्यों समस्या होनी चाहिए? दरअसल जंतर-मंतर प्रयोग सरकारी तंत्र की इसी गैर-जिम्मेदार सोच पर वार था, पर सी.जे.पी. और ‘जेन-काी’ जानते हैं कि सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे से शिक्षा-परीक्षा तंत्र ठीक होने वाला नहीं। इसलिए अब स्कूलों से ही व्यवस्था को दुरुस्त करने की मुहिम शुरू हुई है। शिक्षा और परीक्षा के बाद लक्ष्य रोजगार ही है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया भी निष्पक्ष और पारदर्शी होना जरूरी है, ताकि उसे अदालत में चुनौती देने की जरूरत ही न पड़े। पर सकारात्मक संकेत यह है कि इस बाबत ‘जेन-काी’ और ‘जेन अल्फा’ का दबाव सभी दल-नेता महसूस कर रहे हैं। इसके मूल में है ‘जेन-जी’ की चुनावी ताकत। 

अगले साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां 18 से 29 साल के ‘जेन-काी’ मतदाता लगभग 22 प्रतिशत हैं। इनकी ताकत का अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनाव में इन राज्यों की 250 से ज्यादा सीटों पर हार-जीत का अंतर 5 प्रतिशत से भी कम था। ‘जेन-काी’ ने किसी एक ओर रुख कर लिया तो चुनाव उधर ही पलट जाएगा। महत्वपूर्ण आंकड़ा यह भी है कि अगले लोकसभा चुनाव तक ‘जेन-काी’ मतदाताओं का प्रतिशत 29 हो जाएगा। इसीलिए हर दल और नेता अपने-अपने अंदाज में ‘जेन-काी’ को रिझाने में जुटा है।-राजकुमार सिंह
 

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