पर्याप्त शिक्षकों के अभाव में पढ़ाई कैसे हो!

Edited By Updated: 19 Jul, 2026 04:15 AM

how can studies be conducted in the absence of sufficient teachers

सामाजिक साक्षरता के उद्देश्य से देश भर में सरकारी विद्यालयों की स्थापना की गई है। सस्ती दरों पर उपलब्ध शिक्षा भले ही पहली नकार में सामान्य वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करे किंतु मूलभूत खामियों से दो चार होते ही व्यवस्था से मोहभंग होते देर नहीं लगती।

सामाजिक साक्षरता के उद्देश्य से देश भर में सरकारी विद्यालयों की स्थापना की गई है। सस्ती दरों पर उपलब्ध शिक्षा भले ही पहली नकार में सामान्य वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करे किंतु मूलभूत खामियों से दो चार होते ही व्यवस्था से मोहभंग होते देर नहीं लगती। ज्वलंत उदाहरण है इसी समाचार पत्र में प्रकाशित एक $खबर, जिसके मुताबि$क, छत्तीसगढ़ के महास मुंद किाले के सरायपाली विकास खंड स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जम्हारी में पर्याप्त शिक्षकों की कमी विरोध-प्रदर्शन का सबब बन गई। रोष प्रकटाते छात्रों के कथनानुसार, करीब 150 छात्र-छात्राओं के अध्ययनरत होने पर भी स्कूल में केवल तीन शिक्षक हैं। माहिर शिक्षकों के अभाव में वर्ष 2019-20 के दौरान विज्ञान संकाय का संचालन बंद हो गया। आजकल एकमात्र संचालित कला संकाय में भी कई प्रमुख विषयों के अध्यापक नहीं हैं। गणित, संस्कृत तथा राजनीतिशास्त्र जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों के अध्यापक न होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

इसमें कोई दोराय नहीं, भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था वर्तमान में एक बड़े बदलाव से गुकार रही है। विगत वर्षों में विद्यालयों की संख्या बढऩे के साथ डिजिटल सुधारों ने भी गति पकड़ी। शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी ‘यूनिफाइड इन्फर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस’ की रिपोर्ट के मुताबि$क, देश में कुल शिक्षकों की संख्या 1.02 करोड़ पार करना बेशक सराहनीय है, लेकिन सरकारी स्कूलों में लगभग 9.83 लाख स्वीकृत पद रिक्त  होने संबंधी जानकारी भी नकारी नहीं जा सकती। आर.टी.ई. अधिनियम के विपरीत देश में एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे हैं। विशेषकर, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों का समान वितरण एक बड़ी समस्या है। नई शिक्षा नीति की सिफारिशों के मुताबिक हर 30 विद्यार्थियों के लिए 1 शिक्षक होना चाहिए।

राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक का औसत अनुपात 21:1 भले ही ठीक हो, लेकिन झारखंड जैसे कई रा’यों में हालात गंभीर हैं। यहां उच्च माध्यमिक स्तर का छात्र-शिक्षक अनुपात 47:1 तक पहुंच जाता है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, हर 31 विद्यार्थी के लिए 1 शिक्षक उपलब्ध होने से पंजाब की स्थिति बेहतर आंक सकते हैं, हालांकि गत वर्ष के मुकाबले दाखिले में गिरावट आना भी कटु सत्य है। शिक्षा मंत्रालय की यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक,  रॉय के 1759 स्कूलों में एक ही शिक्षक तैनात है। 19 विद्यालयों में कोई दाखिला नहीं हुआ। 

कुल मिलाकर, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, योग्य शिक्षकों का अभाव, बुनियादी ढांचे संबंधी समस्याएं आदि प्रमुखता से बनी हुई हैं। देश में 18,000 से अधिक शिक्षक शिक्षा संस्थान होने के बावजूद 10 से 12 लाख शिक्षकों के पास अनिवार्य विशिष्ट शिक्षण योग्यता नहीं। सेवा-पूर्व तथा सेवा-कालीन प्रशिक्षणों के स्तर में भारी अंतर है। शिक्षकों के लिए सालाना आयोजित कार्यशाला आधारित प्रशिक्षण में निरंतरता एवं पर्याप्त गुणवत्ता का अभाव देखा गया। दरअसल, लाखों शिक्षक रिटायर होने पर भी नई भर्तियां नियमित रूप से नहीं हो पातीं। कई शिक्षक दूर-दराका के गांवों में नियुक्ति नहीं लेना चाहते। जनगणना, चुनाव जैसे गैर-शैैक्षणिक कार्यों में लगाया जाना भी शिक्षकों की अनुपलब्धता बढ़ा देता है। अतिरिक्त  कार्यभार होने से थकान में इकााफा होता है, मनोबल गिरता है। परिणामस्वरूप रटंत विद्या पर निर्भरता बढऩे से छात्रों की रचनात्मकता तथा आलोचनात्मक सोच प्रभावित हो सकती है। 

यह अभाव मात्र एक संख्या न होकर समूची शिक्षा व्यवस्था कमकाोर करने वाला संकट है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में सामाजिक, भावनात्मक तथा शारीरिक विकास के साथ-साथ शैक्षणिक उपलब्धि भी शामिल होती है। शिक्षकों की कमी से सीखने के परिणामों, समानता तथा समग्र छात्र विकास पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन (जीपीआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पर्याप्त शिक्षक सहयोग के बिना छात्रों से अन्य गतिविधियों में भाग लेने की अपेक्षा घटती है, वास्तव में जो उनके सर्वांगीण विकास में काफी हद तक सहायी बन सकती थीं। शिक्षकों की कमी छात्रों के ‘ड्रॉप आऊट’ में अहम कारण है। अनेकों शैक्षणिक सत्र समयानुसार पूरे नहीं हो पाते। हाशिए पर रहने वाले समुदायों, खासकर ग्रामीण तथा आर्थिक रूप से वंचित छात्रों की योग्य शिक्षकों तक पहुंच सीमित होने के कारण जहां शैक्षिक असमानताओं में वृद्धि होती है, वहीं शिक्षा तंत्र पर वित्तीय दवाब भी बढ़ता है।  

नीति आयोग की ताकाा रिपोर्ट के तहत, सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था एक गहरे भरोसे के संकट से गुकार रही है। यह एक गंभीर मुद्दा है, जिसे बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाकर ही निपटाया जा सकता है। आवश्यक है, समस्या की प्रकृति समझकर सरकार मकाबूत एवं प्रभावी रणनीतियां लागू करे, जिसमें महत्वाकांक्षी शिक्षकों के लिए छात्रवृत्ति, प्रोत्साहन, शैक्षणिक कौशल तथा विषय ज्ञान पर बल देने वाले व्यापक कार्यक्रम बराबर शामिल हों। शिक्षकों की भर्ती, प्रशिक्षण तथा सहायता में अपेक्षित निवेश करके ही भारत एक अधिक प्रभावी तथा समावेशी शिक्षा प्रणाली बना सकता है। देश के भविष्य को चुनौतियों हेतु तैयार करने के लिए स्कूल के बुनियादी ढांचे में सुधार लाना होगा, सभी शिक्षा निकायों को आधुनिक संसाधन व पर्याप्त शिक्षक मुहैया करवाने होंगे। विशेषज्ञों की रायनुसार, समस्या केवल भर्ती से नहीं सुलझ सकती; ग्रामीण व पिछड़े इलाकों में तैनाती, प्रशिक्षण तथा संशोधन भी कारूरी है। एनईपी के अनुसार, शिक्षक केवल पढ़ाने वाले नहीं बल्कि सीखने की प्रेरणा देने वाले भी होने चाहिएं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21-ए के तहत ‘शिक्षा का अधिकार’ प्रत्येक बच्चेे का मौलिक ह$क है, जो उसे मिलना ही चाहिए। काबिल गुरुजनों की बाट जोहते विद्यार्थियों को धरना देना पड़े, हालात से समझौता करना पड़े अथवा विविशतावश निजी स्कूल अपनाने पड़ें, समूचे तौर पर यह सरकारी शिक्षा-तंत्र की ही विफलता है।-दीपिका अरोड़ा  
 

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